Indianewsviral Editorial

सोशल मीडिया को लेकर देश में चल रही बहस अब एक जटिल और विरोधाभासी मोड़ पर पहुंच चुकी है. लोकतंत्र के चारों स्तंभ. विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया. इस विषय पर स्पष्ट और एकमत रुख प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं. परिणामस्वरूप सोशल मीडिया के प्रति भ्रम, अविश्वास और आशंका का वातावरण बन गया है.
राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों के लिए सोशल मीडिया जनता तक सीधी पहुंच का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है. चुनावी अभियान, सरकारी योजनाओं का प्रचार, जनसंवाद और छवि निर्माण. सब कुछ इसी मंच के जरिए तेज़ी से संचालित होता है. लेकिन जब यही सोशल मीडिया सवाल उठाता है, नीतियों की आलोचना करता है या वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने लाता है, तब उसे अव्यवस्थित, भ्रामक और लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जाने लगता है. यही दोहरा दृष्टिकोण उस कहावत को चरितार्थ करता है. गुड़ खाएंगे मगर गुलगुले से परहेज क्यों.
मुख्यधारा मीडिया की स्थिति भी कम विरोधाभासी नहीं है. अनेक समाचार संस्थान सोशल मीडिया पर वायरल सूचनाओं और वीडियो को खबर का आधार बनाते हैं. वहीं दूसरी ओर उसी सोशल मीडिया को फेक न्यूज, ट्रोलिंग और अफवाहों का अड्डा कहकर उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं. यह द्वंद्व बताता है कि समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग और नियमन में है.
सच यह है कि सोशल मीडिया न तो पूर्णतः वरदान है और न ही पूर्णतः अभिशाप. यह एक शक्तिशाली साधन है, जिसका स्वरूप उसके प्रयोग से तय होता है. इसमें गलत सूचना, दुष्प्रचार और ट्रोलिंग जैसी चुनौतियां अवश्य हैं. लेकिन इसका समाधान पूर्ण प्रतिबंध या कठोर नियंत्रण नहीं हो सकता. समाधान डिजिटल साक्षरता, तथ्य जांच की संस्कृति, जवाबदेही और संतुलित नियमन में निहित है.
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी साथ- साथ चलती हैं. सोशल मीडिया ने आम नागरिक को आवाज दी है. उसने सत्ता और व्यवस्था के बीच की दूरी को कम किया है. लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि तथ्य आधारित संवाद को बढ़ावा मिले और कानून के दायरे में रहकर अभिव्यक्ति की जाए.
मीडिया के बदलते स्वरूप ने उन पत्रकारों के सामने एक नया अवसर भी प्रस्तुत किया है, जो पत्रकारिता को पेशा नहीं बल्कि तपस्या मानते हैं. ऐसे कई वरिष्ठ पत्रकार, जो संस्थागत दबाव और ध्रुवीकृत वातावरण में स्वयं को असहज महसूस करते हैं, अब डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का सहारा ले रहे हैं. वे तथ्यों के आधार पर बेझिझक अपनी बात रखने का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन इस स्वतंत्रता की कीमत भी है. संस्थागत सुरक्षा और नियमित आय के अभाव में अनेक पत्रकार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे में समाज और व्यवस्था को इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता को आर्थिक संबल कैसे मिले. यदि लोकतंत्र को सशक्त रखना है, तो स्वतंत्र और जिम्मेदार अभिव्यक्ति को भी संरक्षित करना होगा. अन्यथा यह विरोधाभास बना रहेगा. सोशल मीडिया से लाभ भी चाहिए और उसकी स्वतंत्रता से भय भी. यही द्वंद्व आज की सबसे बड़ी चुनौती है.

