आसनसोल: रूपनारायणपुर की बंद हिंदुस्तान केबल्स फैक्ट्री की विशाल जमीन एक बार फिर औद्योगिक पुनर्विकास की उम्मीदों के केंद्र में है. मंगलवार को नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NICDC) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक तथा NICDC Logistics Data Services Limited के चेयरमैन रजत कुमार सैनी अधिकारियों की टीम के साथ यहां पहुंचे. जमीन का निरीक्षण हुआ. दस्तावेज देखे गए. अधिकारियों के साथ बैठक हुई और अजय नदी के किनारे जीतपुर क्षेत्र की खाली जमीन की संभावनाओं को भी परखा गया.


लेकिन रूपनारायणपुर के लिए असली खबर यह नहीं है कि दिल्ली से अधिकारी आए और जमीन देखकर चले गए. असली सवाल यह है कि इसके बाद क्या होगा ? क्योंकि हिंदुस्तान केबल्स की जमीन ने इससे पहले भी निरीक्षण, संभावनाओं की तलाश और औद्योगिक पुनर्विकास की चर्चाएं देखी हैं. इसलिए इस बार उम्मीद के साथ एक स्वाभाविक सवाल भी खड़ा है- क्या यह दौरा किसी ठोस औद्योगिक परियोजना की शुरुआत बनेगा या एक और निरीक्षण बनकर रह जाएगा?
947 एकड़ जमीन… लेकिन उद्योग की पहली ईंट का इंतजार
हिंदुस्तान केबल्स कभी रूपनारायणपुर की पहचान और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार था. फैक्ट्री बंद होने के बाद इसका असर केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा. स्थानीय बाजार, परिवहन, छोटे व्यवसाय और फैक्ट्री पर निर्भर परिवारों की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हुईं. अब सबसे बड़ा सवाल इस विशाल औद्योगिक जमीन के भविष्य का है.
करीब 947 एकड़ जमीन अपने आप में एक बड़ी औद्योगिक संभावना है. यदि यहां नया उद्योग या औद्योगिक क्षेत्र विकसित होता है तो इसका प्रभाव केवल रूपनारायणपुर तक सीमित नहीं रहेगा. रोजगार, परिवहन, छोटे कारोबार और आसपास के बाजारों तक इसका असर पहुंच सकता है. लेकिन सवाल है- इतनी बड़ी जमीन वर्षों से नए औद्योगिक उपयोग की प्रतीक्षा क्यों कर रही है ?
जमीन है तो उद्योग क्यों नहीं ? अड़चन आखिर कहां है !
अगर जमीन औद्योगिक उपयोग के अनुकूल है और सड़क, रेल, पानी तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं की संभावनाएं मौजूद हैं तो सरकार को अब स्पष्ट करना होगा कि परियोजना आगे बढ़ने में वास्तविक बाधा क्या है.
• जमीन हस्तांतरण का मामला है ?
• कानूनी पेच है ?
• अतिक्रमण है ?
• निवेशक का सवाल है ?
• बुनियादी ढांचे की कमी है ?
•या अभी तक कोई ठोस परियोजना ही तय नहीं हुई है ?
इन सवालों के स्पष्ट जवाब के बिना हर नया निरीक्षण उम्मीद तो पैदा करेगा, लेकिन भरोसा नहीं.
बंद फैक्ट्री के साथ हजारों परिवारों की यादें भी जुड़ी हैं
हिंदुस्तान केबल्स की जमीन केवल 947 एकड़ का भूखंड नहीं है. इसके साथ उस पीढ़ी की यादें जुड़ी हैं जिसने इसी फैक्ट्री से अपना परिवार चलाया. दुकानें चलीं. वाहन चले. बाजार आबाद हुए और रोजगार का एक पूरा तंत्र विकसित हुआ.
आज अगली पीढ़ी के सामने सवाल है- जिस जमीन ने उनके परिवारों को कभी रोजगार दिया, क्या वही जमीन उन्हें फिर रोजगार दे पाएगी ? यही वजह है कि स्थानीय लोगों के लिए नए उद्योग की चर्चा सिर्फ निवेश का विषय नहीं, बल्कि रोजगार और क्षेत्र के आर्थिक पुनर्जीवन का सवाल भी है.
सिर्फ हिंदुस्तान केबल्स नहीं, बंद उद्योगों की पूरी पट्टी मांग रही जवाब
रूपनारायणपुर का सवाल पश्चिम बर्दवान के व्यापक औद्योगिक परिदृश्य से भी जुड़ता है. क्षेत्र में कई पुरानी औद्योगिक परिसंपत्तियां ऐसी हैं जिनके पुनरुद्धार अथवा वैकल्पिक औद्योगिक उपयोग को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं.
ऐसे में सवाल बड़ा है- क्या बंद उद्योगों की जमीन नए उद्योगों और रोजगार का आधार बनेगी या पुराने कारखानों के बंद गेट ही इस औद्योगिक क्षेत्र की पहचान बनते जाएंगे?
NICDC का दौरा उम्मीद जगाता है, मगर कसौटी केवल नतीजा
NICDC औद्योगिक कॉरिडोर और आधुनिक औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी संस्था है. इसलिए उसके शीर्ष अधिकारी का मौके पर पहुंचकर जमीन और संभावनाओं का आकलन करना महत्वपूर्ण है.
मगर रूपनारायणपुर के लिए इस दौरे की असली सफलता तब होगी जब निरीक्षण के बाद अगला कदम भी दिखाई दे. जमीन की स्थिति स्पष्ट हो. बाधाओं की पहचान और समाधान हो. परियोजना तय हो. निवेश की दिशा स्पष्ट हो. निर्माण शुरू हो और रोजगार के अवसर पैदा हों.
वरना फाइल में एक और निरीक्षण जुड़ जाएगा और जमीन पर इंतजार कुछ वर्ष और लंबा हो जाएगा. रूपनारायणपुर ने अधिकारियों की गाड़ियां बहुत देखीं. योजनाओं की चर्चाएं भी बहुत सुनीं. अब निगाह इस बात पर है कि इस दौरे के बाद सरकार और NICDC अगला ठोस कदम क्या उठाते हैं.
क्योंकि बंद फैक्ट्री के सामने उम्मीद की तस्वीर खींचना आसान है. असली परीक्षा 947 एकड़ जमीन पर उद्योग की पहली ईंट रखने की है. रूपनारायणपुर अब निरीक्षण नहीं, उस पहली ईंट का इंतजार कर रहा है.

