सरायकेला: चाईबासा सदर अस्पताल में स्वास्थ्य विभाग की गंभीर लापरवाही के कारण थैलेसीमिया से पीड़ित पांच मासूम बच्चों को बिना जांच किए संक्रमित खून चढ़ा दिया गया, जिससे सभी बच्चे एचआईवी पॉज़िटिव पाए गए. यह घटना चिकित्सा नैतिकता का उल्लंघन और मानवाधिकारों का गंभीर हनन है.

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह घटना इंसानियत को शर्मसार करने वाली है. उन्होंने कहा कि जिन मासूम बच्चों को जीवन देने के लिए रक्त चढ़ाया गया, आज वही रक्त उनके लिए जीवन का श्राप बन गया है. यह राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही का परिणाम है.
श्री मुंडा ने बताया कि झारखंड में जनजातीय समाज थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारियों से जूझ रहा है. भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक देश को “सिकल सेल एनीमिया मुक्त भारत” बनाने का संकल्प लिया है, और वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच लगभग 7 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य रखा गया है. यह योजना विशेष रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे जनजातीय बहुल राज्यों में लागू की गई है.
अर्जुन मुंडा ने कहा कि चाईबासा की यह घटना स्पष्ट संकेत है कि झारखंड में राज्य सरकार की शिथिलता के कारण इस मिशन का क्रियान्वयन कमजोर और अव्यवस्थित है. रक्त जांच और स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं में गंभीर अनियमितताएँ, ब्लड बैंक प्रबंधन में पारदर्शिता का अभाव, और संक्रमण-नियंत्रण प्रोटोकॉल का उल्लंघन निरंतर जारी है.
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि राज्य सरकार ने इस मामले पर दिखावे की कार्रवाई की है, जबकि स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ने पाँच बच्चों की जान जोखिम में डाल दी है. अर्जुन मुंडा ने मांग की कि इस मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच करवाई जाए, झारखंड के सभी जिलों के ब्लड बैंक और अस्पतालों की तत्काल ऑडिट जांच हो, और “सिकल सेल एनीमिया मुक्त भारत” मिशन के राज्य स्तरीय कार्यान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए.
श्री मुंडा ने कहा कि अब समय संवेदनशीलता और जवाबदेही का है. सरकार को दिखावे की कार्रवाई छोड़कर स्वास्थ्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार लाना होगा.

