जामताड़ा: शहर के बाजार रोड स्थित श्री श्री सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति का दुर्गोत्सव अपनी ऐतिहासिक परंपरा, धार्मिक मान्यताओं और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के लिए विशेष पहचान रखता है. यहां मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज और वैष्णव पद्धति से की जाती है. करीब 111 वर्षों से चली आ रही इस पूजा परंपरा में राजघराने की विरासत आज भी जीवंत है. मां दुर्गा के दर्शन और माथा टेकने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. भक्तों के बीच मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत मां दुर्गा पूरी करती हैं. इसी आस्था के कारण बाजार रोड का दुर्गा मंदिर शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शुमार है.


सोने के आभूषणों से होता है मां का शृंगार
बाजार रोड दुर्गोत्सव की सबसे खास पहचान मां दुर्गा का स्वर्ण आभूषणों से होने वाला शृंगार है. मां के गले का हार, मांग टीका, कंगन और मुकुट समेत कई आभूषण सोने के हैं. इन आभूषणों को श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक के रूप में दान किया है. स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित मां दुर्गा की प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी रहती है. हालांकि, प्रतिमा विसर्जन से पहले सभी स्वर्ण आभूषणों को सावधानीपूर्वक उतारकर सुरक्षित रख लिया जाता है.
विदित हो कि यहां मां दुर्गा को जागृत माता के रूप में पूजा जाता है. श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है कि मां अपने भक्तों की पुकार सुनती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं. यही विश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को इस मंदिर से जोड़े हुए है.
राजघराने ने रखी थी दुर्गोत्सव की नींव
बाजार रोड में दुर्गापूजा की शुरुआत वर्ष 1916 में जामताड़ा के तत्कालीन राजघराने की ओर से की गई थी. इस ऐतिहासिक परंपरा को आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है. वर्तमान राजा अजीत सिंह समिति के अध्यक्ष हैं. राजघराने से जुड़ाव के कारण इस पूजा का धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी है.
पूजा की शुरुआत के समय तत्कालीन राजा ने पूजा-अनुष्ठान के खर्च की जिम्मेदारी तिलाबाद के माझी परिवार को सौंपी थी. इसके लिए चास के लिए खेती की जमीन दान में दी गई थी. व्यवस्था यह थी कि खेत में उपजने वाले अनाज को बेचकर प्राप्त राशि से मां दुर्गा की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का खर्च उठाया जाएगा. इसी परंपरा के तहत माझी परिवार पीढ़ियों से पूजा के दायित्व का निर्वहन करता आ रहा है.
एक ही परिवार के पुजारी कराते हैं पूजा
इस दुर्गोत्सव की एक अन्य विशेषता पूजा-पद्धति की निरंतरता है. बताया जाता है कि पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से एक ही परिवार के पुजारी पूजा-अर्चना कराते आ रहे हैं. इससे पूजा की प्राचीन परंपरा और धार्मिक विधानों को आज भी संरक्षित रखा गया है. यहां मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित रहती हैं, जो पारंपरिक प्रतिमा संरचना की विशेषता है.
दशमी को मां को कंधे पर लेकर तिलाबाद जाते हैं श्रद्धालु
बाजार रोड दुर्गोत्सव की सबसे अनूठी परंपराओं में दशमी के दिन मां दुर्गा को तिलाबाद ले जाना शामिल है. इस दिन श्रद्धालु मां की प्रतिमा को कंधे पर लेकर उनके सेवायत माझी परिवार से मिलाने तिलाबाद पहुंचते हैं. यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राजघराने, सेवायत परिवार और श्रद्धालुओं के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों का प्रतीक भी मानी जाती है. इस परंपरा के प्रति लोगों में विशेष श्रद्धा रहती है.
नवमी को अनाथ और वृद्धाश्रम में बांटा जाता है प्रसाद
बाजार रोड पूजा समिति की ओर से धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सामाजिक सरोकारों का भी ध्यान रखा जाता है. नवमी के दिन अनाथ आश्रम और वृद्धाश्रम में प्रसाद वितरित किया जाता है. पूजा की व्यवस्था और आयोजन को सफल बनाने में समिति के 150 से अधिक सदस्य सक्रिय रहते हैं. इस तरह दुर्गोत्सव आस्था के साथ सेवा और सामाजिक सहभागिता का संदेश भी देता है.
रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा शहर
शारदीय दुर्गोत्सव को लेकर जामताड़ा शहर के विभिन्न पूजा पंडाल आकर्षक ढंग से सजाए गए हैं. रंग-बिरंगी विद्युत सज्जा से बाजार रोड समेत पूरा शहर जगमगा रहा है. मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है. भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं. विभिन्न पूजा पंडालों में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी रखी जा रही है. बाजार क्षेत्र में बड़े वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है, जबकि जगह-जगह बैरिकेडिंग कर भीड़ को नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई है.
111 वर्षों की ऐतिहासिक विरासत, स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित मां दुर्गा, जागृत माता के प्रति श्रद्धालुओं का विश्वास और दशमी की परंपरा बाजार रोड दुर्गोत्सव को जामताड़ा की धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है.
रिपोर्ट: मनीष बरनवाल

