चांडिल: विकास के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा अंतर है, इसकी तस्वीर सरायकेला- खरसावां जिले के चांडिल प्रखंड अंतर्गत चवलीबसा पंचायत के खुदियाडीह गांव में देखने को मिल रही है. यहां वर्षों से सड़क की समस्या झेल रहे आदिवासी ग्रामीणों ने सरकारी व्यवस्था से उम्मीद टूटने के बाद अपनी मेहनत की कमाई से चंदा जुटाकर करीब 350 फीट लंबी सड़क का निर्माण कर डाला. ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के लिए पंचायत निधि से स्वीकृत 200 फीट पीसीसी सड़क का निर्माण कार्य बाद में पंचायत के किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया. इसके बाद ग्रामीणों ने खुद ही सड़क बनाने का फैसला लिया.


*200 फीट पीसीसी सड़क की स्वीकृति मिली, मगर गांव में नहीं हुआ निर्माण*
ग्रामीणों के अनुसार खुदियाडीह गांव में मुखिया फंड से करीब 200 फीट लंबी पीसीसी सड़क निर्माण की स्वीकृति मिली थी. जब निर्माण कार्य लाभुक समिति के माध्यम से कराने का प्रस्ताव सामने आया, तब कथित तौर पर इस योजना को गांव से हटाकर पंचायत के दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया.
ग्रामीणों का सवाल है कि जब सड़क निर्माण की स्वीकृति खुदियाडीह के लिए दी गई थी, तो आखिर किसके आदेश पर और किन परिस्थितियों में योजना का स्थान परिवर्तन किया गया ? क्या इसके लिए ग्रामसभा की सहमति ली गई थी ? ग्रामीणों का कहना है कि इस पूरे मामले की जांच होनी चाहिए. हालांकि योजना स्थानांतरित किए जाने के आरोपों पर पंचायत प्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों का पक्ष अभी सामने नहीं आया है.
*रोजी- रोटी की कमाई से खरीदा चारकोल, श्रमदान कर बनाई सड़क*
ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों से गांव की सड़क की स्थिति खराब थी. बारिश के दिनों में आवागमन और भी मुश्किल हो जाता था. जनप्रतिनिधियों से कई बार आश्वासन मिला, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ.
आखिरकार ग्रामीणों ने आपस में चंदा इकट्ठा किया और अपनी रोजी- रोटी की कमाई से कंपनी से चारकोल खरीदकर करीब 350 फीट लंबी सड़क तैयार की. ग्रामीणों ने श्रमदान भी किया. हालांकि यह पीसीसी सड़क नहीं है, लेकिन इससे आवागमन की समस्या कुछ हद तक कम होने की उम्मीद है.
यह पहल ग्रामीणों की एकजुटता का उदाहरण है, लेकिन साथ ही सवाल भी खड़ा करती है कि जिस बुनियादी सुविधा को उपलब्ध कराना सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी है, उसके लिए गरीब ग्रामीणों को अपनी कमाई क्यों खर्च करनी पड़ी?
*मुख्य सड़क के किनारे गांव, फिर भी बिजली- पानी का संकट*
खुदियाडीह गांव चौका- ईचागढ़ सड़क के किनारे बसा है. इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. बिजली और पेयजल की स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं है.
ग्रामीणों के अनुसार सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत समस्याओं को लेकर वर्षों से जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों का ध्यान आकर्षित कराया जाता रहा है. इसके बावजूद गांव की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ.
आदिवासी गांव से छिन गया प्राथमिक विद्यालय, अब बच्चों की पढ़ाई पर संकट
सड़क और पानी के साथ खुदियाडीह में शिक्षा की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है. ग्रामीणों के अनुसार सर्व शिक्षा अभियान के तहत गांव में नव प्राथमिक विद्यालय खोला गया था, लेकिन बाद में इसका दूसरे विद्यालय में विलय कर दिया गया. ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय विलय का निर्णय गांव की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं लिया गया. गांव के बच्चों को अब पढ़ाई के लिए करीब डेढ़ से दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है.
सबसे गंभीर बात यह है कि विलय किए गए विद्यालय तक पहुंचने के लिए छोटे बच्चों को अत्यंत व्यस्त चौका-पातकुम सड़क पार करनी पड़ती है. ऐसे में अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता बनी रहती है.
गांव में 35 से 40 बच्चे, फिर विद्यालय का विलय क्यों ?
ग्रामीणों का दावा है कि खुदियाडीह में पांच से 12 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 35 से 40 बच्चे हैं. इसके बावजूद गांव का प्राथमिक विद्यालय दूसरे विद्यालय में विलय कर दिया गया. ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि चांडिल प्रखंड में ऐसे विद्यालय भी हैं, जहां महज पांच से दस बच्चे नामांकित होने के बावजूद विद्यालय संचालित हैं. ऐसे में खुदियाडीह के विद्यालय का विलय किन मानदंडों के आधार पर किया गया, इसकी समीक्षा होनी चाहिए. ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षा के अधिकार के तहत छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित और सुलभ प्रारंभिक शिक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है. विद्यालय की दूरी के साथ सड़क पार करने के जोखिम का भी आकलन किया जाना चाहिए.
सवालों के घेरे में पंचायत प्रशासन और शिक्षा विभाग
खुदियाडीह के ग्रामीणों की समस्याएं अब कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रही हैं. गांव के लिए स्वीकृत सड़क योजना आखिर क्यों स्थानांतरित हुई ? क्या योजना परिवर्तन में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया ? गांव के बच्चों की संख्या और आवागमन की कठिनाइयों के बावजूद प्राथमिक विद्यालय का विलय क्यों किया गया ? बिजली और पेयजल की समस्याओं का समाधान कब होगा ?
इन सवालों पर पंचायत प्रतिनिधियों, प्रखंड प्रशासन और शिक्षा विभाग से जवाब अपेक्षित है
खुदियाडीह के ग्रामीणों ने अपनी मेहनत से 350 फीट सड़क बनाकर आत्मनिर्भरता का परिचय जरूर दिया है, लेकिन यह सरकारी व्यवस्था के लिए उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है. जिस गांव के लोग अपनी रोजी- रोटी से पैसे बचाकर सड़क बनाने को मजबूर हों और जहां छोटे बच्चों को शिक्षा के लिए व्यस्त सड़क पार करनी पड़े, वहां विकास योजनाओं की प्राथमिकताओं की समीक्षा जरूरी है. अब देखना होगा कि जिला प्रशासन खुदियाडीह की समस्याओं का संज्ञान लेकर सड़क योजना के स्थानांतरण की जांच कराता है या ग्रामीणों को एक बार फिर आश्वासन देकर छोड़ दिया जाता है.

