सरायकेला: चांडिल बांध से प्रभावित एवं विस्थापित परिवारों के लंबित अधिकारों को लेकर बुधवार को विस्थापित एक बार फिर सड़क पर उतरे. ‘विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन’ और ‘विस्थापित मुक्ति वाहिनी’ के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय शांतिपूर्ण धरना- प्रदर्शन कर पुनर्वास, मुआवजा, रोजगार, जमीन का पट्टा और पुनर्वास स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं समेत 15 सूत्री मांगें उठाई गईं.


आंदोलनकारियों ने कहा कि चांडिल बांध परियोजना के वर्षों बाद भी बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगा रहे हैं. संगठनों ने प्रशासन और संबंधित विभागों को मांगपत्र सौंपते हुए तीन महीने के भीतर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई शुरू करने की मांग की है.
पट्टा से मुआवजे तक, 15 सूत्री मांगपत्र
संगठनों की प्रमुख मांगों में झारखंड राज्य विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग का गठन एवं प्रभावी क्रियान्वयन, पुनर्वास स्थलों के भूखंडों का पट्टा और सीमांकन, कथित अवैध कब्जे हटाना तथा आंशिक रूप से प्रभावित गांवों का पुनः सर्वेक्षण शामिल है.

भूमि, पेड़- पौधे, तालाब, कुआं, बाउंड्री वॉल और अन्य परिसंपत्तियों के लंबित मुआवजे का भुगतान करने की भी मांग की गई. इसके अलावा सभी 116 प्रभावित गांवों में समान प्रावधान लागू करने और विकास पुस्तिका से संबंधित लंबित मामलों के निष्पादन की मांग उठाई गई.
विस्थापित संगठनों ने पुनर्वास नीति-2012 के तहत आवास, गृह निर्माण, परिवहन, स्वरोजगार एवं जीवन निर्वाह से संबंधित अनुदान राशि को वर्तमान परिस्थितियों और महंगाई के अनुरूप बढ़ाने तथा जिन परिवारों को आंशिक भुगतान मिला है, उन्हें शेष देय राशि देने की मांग की.
पुनर्वास कार्यालयों में ‘दलाल प्रथा’ का आरोप
संयुक्त मंच ने पुनर्वास कार्यालय संख्या-2, विशेष भू-अर्जन कार्यालय एवं अन्य संबंधित कार्यालयों में कथित दलाल प्रथा पर रोक लगाने की मांग की. संगठनों का आरोप है कि विस्थापितों से जुड़े कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत है. उन्होंने मांग की कि विस्थापित परिवारों के सभी काम निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के तहत सीधे किए जाएं और किसी तरह की अनियमितता सामने आने पर उसकी जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए.
सोलर प्रोजेक्ट से पहले ग्रामसभा की मांग
प्रस्तावित सोलर प्रोजेक्ट को लेकर भी आंदोलनकारियों ने महत्वपूर्ण मांग रखी. उनका कहना है कि जलाशय क्षेत्र में किसी परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले उससे प्रभावित होने वाले विस्थापित परिवारों के हित सुरक्षित किए जाएं.
संबंधित गांवों में विधिवत ग्रामसभा आयोजित करने तथा मत्स्य पालन एवं मछली पकड़कर आजीविका चलाने वाले परिवारों पर परियोजना के संभावित प्रभाव का आकलन कर उनके लिए वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित करने की मांग की गई. मत्स्य पालन और नौकायन से जुड़े अवसरों में स्थानीय विस्थापितों को प्राथमिकता देने की मांग भी उठी.
अधिकार मिले बिना जल भंडारण आगे न बढ़े
धरना में संगठनों ने मांग रखी कि प्रभावित परिवारों के भूमि, मुआवजा, अनुदान, पुनर्वास एवं अन्य देय अधिकारों का निपटारा किए बिना प्रभावित क्षेत्रों में आगे जल भंडारण नहीं किया जाए.
रोजगार के सवाल पर भर्ती नियमावली-2025 के प्रावधानों के तहत संबंधित क्षेत्रीय कार्यालयों में प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई. संगठनों का कहना है कि पात्र विस्थापितों को सरकारी नौकरी उपलब्ध कराना संभव नहीं होने की स्थिति में नियमानुसार वैकल्पिक रोजगार अथवा उचित पुनर्वास सहायता की व्यवस्था की जाए.
हर महीने मांगी प्रगति रिपोर्ट
विस्थापित संगठनों ने चांडिल जलाशय और पुनर्वास से संबंधित योजनाओं, प्रस्तावों, स्वीकृतियों एवं कार्यों की मासिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक करने और उसकी प्रति दोनों संगठनों को उपलब्ध कराने की मांग की.
प्राकृतिक आपदा अथवा वन्यजीवों से फसल, मकान, संपत्ति या जनहानि होने की स्थिति में तत्काल स्थल निरीक्षण कर नियमानुसार मुआवजा एवं सहायता देने तथा विस्थापित गांवों और पुनर्वास स्थलों तक सरकारी योजनाओं एवं मूलभूत सुविधाओं का लाभ पहुंचाने की मांग भी की गई.
तीन महीने की मोहलत, फिर आंदोलन तेज करने की चेतावनी
संयुक्त मंच ने प्रशासन और संबंधित विभागों को तीन महीने का समय दिया है. संगठनों ने कहा कि इस अवधि में मांगों पर ठोस एवं समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई तो लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आंदोलन का अगला चरण शुरू किया जाएगा.
संगठनों के मुताबिक अगले चरण में अनिश्चितकालीन धरना, भूख हड़ताल, जनसभा, रैली और मशाल जुलूस जैसे कार्यक्रम किए जा सकते हैं. इसके बाद भी समाधान नहीं होने पर विधानसभा एवं मुख्यमंत्री आवास के समक्ष प्रदर्शन जैसे कार्यक्रमों पर विचार किया जाएगा.
संयुक्त मंच ने स्पष्ट किया कि आंदोलन किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ नहीं, बल्कि विस्थापित परिवारों के अधिकार, पुनर्वास और लंबित दावों के समाधान के लिए है.
चांडिल बांध के विस्थापितों का सवाल अब सीधा है- परियोजना के लिए अपनी जमीन और गांव देने वाले परिवारों को अपने हिस्से के अधिकार के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा ?

