आसनसोल: कभी कारखानों की मशीनों की आवाज से गूंजने वाला आसनसोल- रानीगंज औद्योगिक क्षेत्र आज कई जगह बंद और निष्क्रिय औद्योगिक परिसरों की विरासत भी ढो रहा है. इन परिसरों में पड़े पुराने लोहे, मशीनरी, पाइप, बीम और दूसरे धातु सामान की कीमत लाखों- करोड़ों तक पहुंच सकती है. यही बेशकीमती स्क्रैप अब सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है.


सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि स्क्रैप का वैध कारोबार अपराध नहीं है. लेकिन किसी कारखाने या औद्योगिक परिसर से बिना अनुमति लोहा निकालना, चोरी का माल खरीदना अथवा बिना वैध दस्तावेज उसका परिवहन और बिक्री करना कानूनन अपराध है. ऐसे में असली सवाल स्क्रैप कारोबार का नहीं, स्क्रैप के स्रोत का है.
कारखाना बंद हुआ है, उसकी संपत्ति ‘लावारिस’ नहीं हुई
आसनसोल औद्योगिक क्षेत्र में कई पुराने कारखाने वर्षों से बंद पड़े हैं या उनकी गतिविधियां सीमित हुई हैं. ऐसे परिसरों में वर्षों पुरानी मशीनरी और लोहे के विशाल ढांचे मौजूद हो सकते हैं. यहीं सबसे बड़ी गलतफहमी पैदा होती है. किसी कारखाने का उत्पादन बंद हो जाने का मतलब यह नहीं कि उसके परिसर में पड़ा लोहा लावारिस हो गया.
उस संपत्ति का स्वामित्व संबंधित कंपनी, सरकारी संस्था, परिसमापक अथवा किसी अन्य वैधानिक इकाई के पास हो सकता है. इसलिए बिना अनुमति एक किलो लोहा निकालना भी वैध स्क्रैप कारोबार नहीं कहा जा सकता.
बर्नपुर में स्क्रैप का विवाद नया नहीं
बर्नपुर का औद्योगिक इतिहास IISCO Steel Plant से गहराई से जुड़ा है. विशाल औद्योगिक ढांचे के कारण यहां स्क्रैप की आर्थिक कीमत भी हमेशा महत्वपूर्ण रही है. पुरानी मीडिया रिपोर्टों में भी IISCO के स्क्रैप को लेकर आपराधिक गिरोहों के बीच संघर्ष और औद्योगिक परिसर से स्क्रैप बाहर निकालकर बाजार में खपाने के आरोप सामने आते रहे हैं.
वर्ष 2011 में एक ठेकेदार की हत्या की जांच के दौरान भी कारोबारी प्रतिद्वंद्विता की आशंका सामने आई थी और उस समय बड़े मूल्य की स्क्रैप निविदा को लेकर प्रतिस्पर्धा की चर्चा हुई थी. वैसे इन पुराने मामलों को आज के कारोबारियों के खिलाफ प्रमाण नहीं माना जा सकता. लेकिन इतना जरूर स्पष्ट होता है कि बर्नपुर में स्क्रैप की अर्थव्यवस्था और उससे जुड़े विवादों का इतिहास पुराना है.
2023 में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने फिर खींचा था ध्यान
दिसंबर 2023 में आसनसोल- रानीगंज औद्योगिक क्षेत्र में आयकर विभाग की तलाशी ने स्क्रैप कारोबार को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया था. उस समय की रिपोर्टों में पूर्व विधायक सोहराब अली और स्क्रैप कारोबारी सैयद/एमडी इम्तियाज अहमद से जुड़े परिसरों का उल्लेख किया गया था. जांच में IISCO से स्क्रैप बिक्री से संबंधित कथित कर चोरी के पहलुओं की पड़ताल किए जाने की बात सामने आई थी. इसी अवधि की कुछ रिपोर्टों में CBI जांच के संदर्भ में भी स्क्रैप कारोबार से जुड़े लोगों और एक पूर्व CISF कर्मी के कथित संपर्क की जांच का उल्लेख किया गया था.
कुल्टी की घटना ने बताया- सुरक्षा का सवाल वास्तविक है
सितंबर 2024 में SAIL के Kulti Growth Works परिसर में दो लोगों के घायल अथवा मृत पाए जाने की घटना के बाद भी स्क्रैप चोरी को लेकर सवाल उठे थे. उस समय मीडिया रिपोर्टों में स्थानीय लोगों की ओर से दोनों के कथित रूप से स्क्रैप चोरी के लिए परिसर में प्रवेश करने का आरोप सामने आया था. CISF ने आरोपों से इनकार करते हुए विभागीय जांच की बात कही थी. घटना का अंतिम निष्कर्ष चाहे जो रहा हो, इसने इतना जरूर दिखाया कि पुराने औद्योगिक परिसरों में अनधिकृत प्रवेश और सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता.
छोटा चोर दिख जाता है, लेकिन चोरी का लोहा खरीदने वाला कौन ?
स्क्रैप चोरी की जांच में सबसे आसान चेहरा उस व्यक्ति का होता है जो लोहे का टुकड़ा उठाते हुए पकड़ा जाता है. लेकिन असली नेटवर्क उसके आगे शुरू होता है. अगर किसी बंद कारखाने से एक ट्रक पुराना लोहा निकलता है तो वह ट्रक हवा में गायब नहीं होता. कोई उसे खरीदता है. कहीं उसका वजन होता है. किसी यार्ड में माल उतरता है. फिर वह किसी दूसरे कारोबारी, रोलिंग मिल या औद्योगिक इकाई तक पहुंच सकता है. इसलिए स्क्रैप चोरी रोकनी है तो सिर्फ लोहे के साथ पकड़े गए व्यक्ति तक जांच सीमित रखने से काम नहीं चलेगा. जांच को यह पता लगाना होगा कि माल कहां से निकला, किस वाहन से गया, गेट पास और चालान था या नहीं, किस कांटे पर वजन हुआ, किस यार्ड में उतरा, खरीदार कौन था और भुगतान किस माध्यम से हुआ.
एक ट्रक लोहा बिना निशान छोड़े कैसे गुजर सकता है ?
यही वह सवाल है जहां पुलिस और प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि भारी मात्रा में औद्योगिक स्क्रैप अवैध तरीके से किसी परिसर से बाहर निकलता है तो उसके परिवहन के लिए वाहन चाहिए. वाहन सड़क से गुजरेगा. किसी स्थान पर माल उतरेगा और आखिर में उसका आर्थिक लेन-देन भी होगा. ऐसे में CCTV, वाहन नंबर, ई-वे बिल जहां लागू हो, चालान, गेट पास, वजन पर्ची और खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड की जांच पूरे नेटवर्क तक पहुंचने में मदद कर सकती है.
वैध कारोबारी और अवैध नेटवर्क में फर्क जरूरी
बर्नपुर और आसनसोल में दशकों से वैध स्क्रैप कारोबार भी होता रहा है. इसलिए प्रत्येक स्क्रैप कारोबारी को संदेह के घेरे में खड़ा करना न उचित है, न तथ्यसंगत. बल्कि अवैध कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई वैध कारोबारियों के हित में भी है. प्रशासन की जांच का केंद्र यह होना चाहिए कि
• स्क्रैप आया कहां से ?
• उसके स्वामित्व और बिक्री के दस्तावेज क्या हैं ?
•और खरीदार ने माल का स्रोत सत्यापित किया या नहीं ?
बंद कारखाने कहीं ‘ओपन स्क्रैप यार्ड’ न बन जाएं
बर्न स्टैंडर्ड, हिंदुस्तान केबल्स सहित आसनसोल औद्योगिक क्षेत्र की कई पुरानी इकाइयों के बंद होने की कहानी रोजगार और औद्योगिक पतन से जुड़ी रही है. अब इनकी परिसंपत्तियों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण सवाल है. किसी बंद कारखाने को सिर्फ इसलिए असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता कि वहां उत्पादन नहीं हो रहा.
कारखाना बंद है, कानून नहीं
अगर वहां करोड़ों की सरकारी या कंपनी की संपत्ति पड़ी है तो उसकी सुरक्षा और नियमित इन्वेंट्री भी उतनी ही जरूरी है.
अब यार्ड से पहले ‘स्रोत’ जांचने की जरूरत
आसनसोल-दुर्गापुर पुलिस कमिश्नरेट और संबंधित औद्योगिक सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती बड़ी जरूर है, लेकिन जांच की दिशा स्पष्ट हो सकती है. रात में भारी स्क्रैप लेकर गुजरने वाले संदिग्ध वाहनों की जांच, पुराने औद्योगिक परिसरों की नियमित निगरानी, बड़े स्क्रैप यार्डों के खरीद रिकॉर्ड का सत्यापन और संदिग्ध माल के स्रोत की जांच से तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है. और यदि किसी बंद औद्योगिक परिसर से लगातार चोरी की शिकायत आती है तो केवल सुरक्षा गार्ड बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. चोरी के माल को खरीदने वाले संभावित बाजार तक पहुंचना होगा.
लोहा चोरी करने वाले हाथ से ज्यादा जरूरी है उसे खरीदने वाली जेब तक पहुंचना
आसनसोल के स्क्रैप कारोबार के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है. चोरी का लोहा अगर बिक नहीं सकता तो चोरी की अर्थव्यवस्था ज्यादा दिनों तक चल नहीं सकती. इसलिए कार्रवाई सिर्फ उस आदमी पर नहीं होनी चाहिए जो दीवार फांदकर लोहा निकालता है. कानून की पहुंच उस वाहन, वजन कांटे, गोदाम, स्क्रैप यार्ड, खरीदार और अंतिम उपभोक्ता तक भी होनी चाहिए जहां चोरी की संपत्ति को वैध माल की शक्ल मिलने की आशंका हो. आसनसोल के बंद कारखानों पर यदि सचमुच ‘गिद्ध’ जैसी नजरें लगी हैं तो प्रशासन को सिर्फ कारखाने की चारदीवारी नहीं, उस पूरी सप्लाई चेन पर नजर रखनी होगी जिसके बिना एक किलो चोरी का लोहा भी बाजार में पैसा नहीं बन सकता.

