जमशेदपुर: लौहनगरी में इन दिनों पुलिसिंग का गणित कुछ दिलचस्प नजर आ रहा है. अपराधी वारदात करें तो जांच बैठाइए, अपराधी हाथ नहीं आएं तो टीम बनाइए और इस बीच पुलिस महकमे में अनुशासन दिखाना हो तो किसी थानेदार की कुर्सी खिसका दीजिए. नतीजा यह कि शहर में इन दिनों अपराध से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि अगला नंबर किसका है.


एसएसपी डॉ. एहतेशाम वकारिब ने 48 घंटे के भीतर दो थाना प्रभारियों पर कार्रवाई की है. सीतारामडेरा थाना प्रभारी आनंद मिश्रा को भी कर्तव्य में लापरवाही और पुलिसिंग में शिथिलता के आरोप में निलंबित किया गया है. सार्वजनिक रिपोर्टों में निलंबन का यही आधिकारिक कारण सामने आया है. अब पुलिस महकमे में चुटकी ली जा रही है कि अपराधियों की लोकेशन मिले न मिले, थानेदार की कुर्सी की लोकेशन बदलने में देर नहीं लग रही.
डकैत सोना लेकर निकल गए, इधर कुर्सियों का हिसाब जारी
शहर की कानून-व्यवस्था पर सवाल हवा में पैदा नहीं हुए हैं. गोलमुरी के केनरा बैंक से हथियारबंद अपराधी करीब 23 किलो सोना और 43 लाख रुपये नकद लूट ले गए. वारदात इतनी गंभीर रही कि पांच आरोपियों पर दो-दो लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया. मामला पुलिस मुख्यालय तक पहुंचा. एक अक्टूबर को डीजीपी तदाशा मिश्रा ने जमशेदपुर पहुंचकर बैंक डकैती और फायरिंग की घटनाओं की उच्चस्तरीय समीक्षा की और आरोपियों की गिरफ्तारी, तकनीकी जांच तथा खुफिया तंत्र मजबूत करने के निर्देश दिए. यानी अपराधियों ने ऐसी घंटी बजाई कि आवाज रांची पुलिस मुख्यालय तक पहुंच गई. अब सवाल व्यंग्य में ही सही, लेकिन पूछा तो जाएगा- सरकार और पुलिस मुख्यालय के लिए क्राइम कंट्रोल का पैमाना आखिर है क्या ? अपराधी पकड़े जाएं या थानेदार बदले जाएं ?
फायरिंग हुई तो गोली अपराधियों ने चलाई, निशाना कुर्सियां भी बनीं
बिंदल मॉल में हुई फायरिंग के मामले में पुलिस ने चार आरोपियों को छत्तीसगढ़ से गिरफ्तार किया और अन्य आरोपियों के खिलाफ भी कार्रवाई की. इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि इस मामले में पुलिस के हाथ पूरी तरह खाली हैं. लेकिन एक के बाद एक बड़ी वारदातों के बीच लगातार निलंबन और तबादलों ने अलग चर्चा छेड़ दी है. पुलिस महकमे में मानो नया मुहावरा चल पड़ा है-
“गोली कहीं चले, कुर्सी कहीं हिले.”
सीतारामडेरा की कहानी में असली ‘ट्विस्ट’ अभी बाकी
एक अक्टूबर के बाराद्वारी गोलीकांड में पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया और हथियार बरामद करने का दावा किया. इसके बावजूद थाना प्रभारी आनंद मिश्रा निलंबित हो गए. सार्वजनिक रिपोर्ट में भी इस कार्रवाई को बाराद्वारी फायरिंग से जोड़ते हुए लापरवाही का मामला बताया गया है. लेकिन पुलिस विभाग के अंदरखाने चल रही कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प और गंभीर है. विभागीय सूत्रों में चर्चा है कि एक आरोपी के कथित ‘हाफ एनकाउंटर’ को लेकर थाना प्रभारी और वरीय स्तर के बीच मतभेद हुआ. दावा यहां तक है कि बात तीखी नोकझोंक तक पहुंची और थाना प्रभारी ने थानेदारी छोड़ने की पेशकश कर दी. इसके बाद घटनाक्रम ने तेजी से करवट ली.
वैसे इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए सवाल कप्तान से भी है और पुलिस मुख्यालय से भी- यदि चर्चा गलत है तो उसका स्पष्ट खंडन होना चाहिए और यदि कार्रवाई केवल लापरवाही पर हुई है तो उस लापरवाही का स्पष्ट आधार सामने रखने में हर्ज क्या है ?
पत्नी का इलाज मांगा था या ‘लाइन’ का टिकट ?
मामले में एक और दिलचस्प मोड़ है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आनंद मिश्रा ने पत्नी की बीमारी और इलाज का हवाला देकर थाना प्रभारी की जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने का अनुरोध किया था. अब महकमे में इसे लेकर भी कटाक्ष हो रहा है- साहब ने छुट्टी जैसी राहत मांगी थी, व्यवस्था ने पुलिस लाइन की राह दिखा दी ! असल परिस्थितियां विभाग बेहतर जानता होगा, लेकिन कार्रवाई की टाइमिंग ने सवालों को जन्म जरूर दिया है.
सरकार देख रही है, मुख्यालय समीक्षा कर रहा है और शहर पूछ रहा है
राज्य सरकार के लिए भी सवाल असहज करने वाला है. अगर जमशेदपुर जैसे महत्वपूर्ण औद्योगिक शहर में बैंक डकैती और लगातार फायरिंग जैसी घटनाओं के बाद खुद डीजीपी को समीक्षा करनी पड़ रही है, तो केवल अधीनस्थ अधिकारियों पर कार्रवाई से कानून-व्यवस्था की पूरी जवाबदेही तय नहीं हो जाती. पुलिस मुख्यालय की जिम्मेदारी भी सिर्फ बैठक, निर्देश और समीक्षा तक सीमित नहीं हो सकती. थानेदारों को जवाबदेह बनाना प्रशासनिक अधिकार है. लापरवाही मिले तो कार्रवाई भी होनी चाहिए. मगर जनता के लिए असली रिपोर्ट कार्ड यह नहीं है कि कितने थाना प्रभारी सस्पेंड हुए, कितने बदले गए और किसे पुलिस लाइन भेजा गया. असली रिपोर्ट कार्ड यह है कि अपराध कितना घटा और बड़ी वारदातों में कितने अपराधी सलाखों के पीछे पहुंचे. फिलहाल जमशेदपुर पुलिस में कुर्सियों की हलचल तेज है. अपराधियों के खिलाफ भी कार्रवाई चल रही है, मगर बड़ी वारदातों के बीच सस्पेंशन और ट्रांसफर की रफ्तार ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है-
“कप्तान साहब, थाना प्रभारी बदलने से थाना बदलता है, लेकिन क्या अपराध का ग्राफ भी बदलता है ?”
और रांची पुलिस मुख्यालय तथा सरकार के लिए सवाल इससे भी छोटा है- “समीक्षा बहुत हुई साहब, अब नतीजा कब दिखेगा ?”
नोट: ‘हाफ एनकाउंटर’ और उससे जुड़े कथित विवाद का हिस्सा विभागीय सूत्रों में चल रही चर्चा पर आधारित है. इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

