सरायकेला: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को सरायकेला जेल परिसर में जेल अदालत-सह-चिकित्सा जांच शिविर-सह-कानूनी जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिला विधिक सेवा प्राधिकार, सरायकेला-खरसावां की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बंदियों को उनके संवैधानिक अधिकारों, निःशुल्क विधिक सहायता, नशामुक्ति और पुनर्वास के संबंध में जानकारी दी गई.


कार्यक्रम के दौरान आयोजित जेल अदालत में बंदियों की ओर से कुल सात आवेदन प्राप्त हुए. इनमें से 23 वर्ष पुराने एक मामले का निष्पादन किया गया. वहीं, शेष आवेदनों को आवश्यक कार्रवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया गया. जेल अदालत के माध्यम से बंदियों को अपने मामलों से जुड़ी समस्याएं रखने और कानूनी सहायता प्राप्त करने का अवसर मिला.
झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार, रांची के निर्देशानुसार आयोजित कार्यक्रम प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-जिला विधिक सेवा प्राधिकार के अध्यक्ष रामाशंकर सिंह के मार्गदर्शन तथा प्राधिकार के सचिव तौसीफ मेराज के पर्यवेक्षण में हुआ. कार्यक्रम का उद्देश्य जेल में निरुद्ध व्यक्तियों को न्यायिक प्रक्रिया, उनके कानूनी अधिकारों और समाज की मुख्यधारा में लौटने के अवसरों के प्रति जागरूक करना था.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव तौसीफ मेराज ने महात्मा गांधी के जीवन, संघर्ष और सत्याग्रह के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा, शांतिपूर्ण प्रतिरोध और दृढ़ संकल्प के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया. उनके आदर्श आज भी समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए प्रासंगिक हैं.
उन्होंने बंदियों को बताया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी समस्याओं और शिकायतों के समाधान के लिए कानूनसम्मत और संवैधानिक रास्ता अपनाने का अधिकार है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण के महत्व की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार और गरिमा का सम्मान किया जाना आवश्यक है.
कानूनी जागरूकता कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की DAWN योजना, 2025 के संबंध में भी बंदियों को जानकारी दी गई. उन्हें नशे के दुष्परिणामों, नशामुक्ति, उपचार, परामर्श और पुनर्वास के महत्व के बारे में बताया गया. साथ ही स्वस्थ और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने तथा आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया गया.
इसके अलावा NALSA की SPRUHA योजना के उद्देश्यों और प्रावधानों की जानकारी भी दी गई. बंदियों को उपलब्ध विधिक सेवाओं और सहायता के बारे में बताया गया. सचिव तौसीफ मेराज ने कहा कि कानूनी समस्या या अपने अधिकारों से संबंधित किसी भी जानकारी और सहायता के लिए बंदी विधिक सेवा संस्थाओं से संपर्क कर सकते हैं. विधिक सहायता और पुनर्वास के माध्यम से जरूरतमंद लोगों को न्याय तक पहुंच उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है.
कार्यक्रम के तहत न्यायिक पदाधिकारियों, सहायक लोक अभियोजक तथा विधिक सहायता बचाव अधिवक्ता दल के सदस्यों ने जेल के महिला वार्ड का निरीक्षण किया. इस दौरान महिला बंदियों से बातचीत कर उनके स्वास्थ्य, कुशलक्षेम और मुकदमों की वर्तमान स्थिति की जानकारी ली गई. साथ ही यह भी जानकारी ली गई कि उन्हें उचित कानूनी प्रतिनिधित्व और निःशुल्क विधिक सहायता मिल रही है या नहीं. महिला बंदियों की समस्याओं को सुनकर उनके समाधान के लिए आवश्यक पहल करने पर भी जोर दिया गया.
जेल परिसर में आयोजित चिकित्सा जांच शिविर में चिकित्सा पदाधिकारी धर्मेश्वर महाली और अभिमन्यु महतो के नेतृत्व में चिकित्सा दल ने बंदियों के स्वास्थ्य की जांच की. जांच के दौरान आवश्यकतानुसार चिकित्सकीय परामर्श और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई. कार्यक्रम में बंदियों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक और सामाजिक कल्याण के महत्व पर भी जोर दिया गया.
कार्यक्रम में सिविल जज सीनियर डिवीजन-III-सह-न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी अनामिका किस्कू, सहायक लोक अभियोजक देव प्रताप तिवारी, चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल दिलीप कुमार शॉ, डिप्टी चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल सुनीत कर्मकार, असिस्टेंट लीगल एड डिफेंस काउंसिल अंबिका चरण पाणि और विजय कुमार महतो सहित अन्य संबंधित पदाधिकारी और कर्मी उपस्थित रहे.
कार्यक्रम के समापन पर न्यायिक पदाधिकारियों और अन्य उपस्थित सदस्यों ने महात्मा गांधी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी. गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के माध्यम से बंदियों को यह संदेश दिया गया कि जेल में निरुद्ध होने के बावजूद वे अपने संवैधानिक अधिकारों, न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता से वंचित नहीं हैं. नशामुक्ति, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समावेशन के माध्यम से उन्हें सम्मानजनक जीवन की ओर लौटने के अवसर उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया.
प्रमोद सिंह: संपादक

