जमशेदपुर: बिष्टुपुर सर्किट हाउस एरिया में टाटा लीज भूमि विवाद पर खबर प्रकाशित होने के बाद कथित तौर पर जमीन माफिया और अधिक सक्रिय हो गए हैं. सूत्रों के अनुसार, विवादित भूखंड पर गतिविधियां पहले की तुलना में अब दोहरी गति से कराई जा रही हैं. यह स्थिति टाटा स्टील के संबंधित विभाग के अधिकारियों, स्थानीय प्रशासन और जमीन माफियाओं की कथित मिलीभगत की ओर इशारा करती है. सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह सब कुछ झारखंड हाईकोर्ट के स्टे आदेश के बावजूद किए जाने के आरोपों के बीच सामने आया है.

यह पूरा मामला बिष्टुपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत सर्किट हाउस इलाके में स्थित टाटा लीज भूमि से जुड़ा है. करीब 11 हजार वर्गफुट की यह भूमि टाटा स्टील के स्वामित्व में है और वर्तमान में झारखंड हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इस केस में टाटा स्टील स्वयं शिकायतकर्ता है और कोर्ट द्वारा विवादित भूमि पर स्टेटस-क्वो बनाए रखने का स्पष्ट आदेश दिया गया है. विवादित भूमि सर्किट हाउस क्षेत्र के होल्डिंग नंबर 7 में स्थित है. पूर्व में टाटा स्टील ने इस भूमि को इंजीनियर सिंडीकेट को सीमित उद्देश्य के तहत विकसित करने की अनुमति दी थी, ताकि टाटा स्टील के इंजीनियरों के लिए आवासीय सुविधा उपलब्ध कराई जा सके. लीज की शर्तों के अनुसार, भूमि का किसी भी प्रकार से व्यावसायिक उपयोग या तृतीय पक्ष को हस्तांतरण प्रतिबंधित था.
तकनीकी रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2010-11 के आसपास इंजीनियर सिंडीकेट ने टाटा प्रबंधन को बिना सूचना दिए भूमि का नियंत्रण अंजुम नामक बिल्डर को सौंप दिया. इसके बाद यहां व्यावसायिक रूप से “अंकल किचन” का संचालन किया गया, जो बाद में बंद हो गया. यह पूरा उपयोग टाटा लीज शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन माना जाता है. इसके बाद आरोप है कि इंजीनियर सिंडीकेट के कुछ सदस्यों ने लगभग 3000 वर्गफुट भूमि बिल्डर विकास सिंह को भी हस्तांतरित कर दी. इस हस्तांतरण में भी न तो टाटा स्टील की अनुमति ली गई और न ही किसी वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया.
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मामला यहीं नहीं रुका. अंजुम द्वारा समय कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के साथ लगभग 1100 वर्गफुट भूमि का तृतीय पक्ष एग्रीमेंट कर लिया गया. जब समय कंस्ट्रक्शन ने मौके पर कब्जा लेकर निर्माण कार्य शुरू किया, तब टाटा स्टील ने मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया. हाईकोर्ट में मामला दर्ज होते ही निर्माण कार्य पर तत्काल रोक लगा दी गई और स्टेटस-क्वो का आदेश पारित किया गया. इसके बावजूद हाल के दिनों में विवादित भूखंड पर बाउंड्री वॉल का रंग-रोगन, धार्मिक अनुष्ठान और सार्वजनिक गतिविधियों के आयोजन की जानकारी सामने आई है. यदि ये गतिविधियां कोर्ट की अनुमति के बिना की गई हैं, तो तकनीकी रूप से यह न्यायालय की अवमानना और टाटा लीज भूमि पर अवैध कब्जे की श्रेणी में आती हैं. कानूनन, स्टे आदेश के दौरान किसी भी प्रकार की गतिविधि भूमि की प्रकृति में परिवर्तन मानी जाती है.
इस पूरे प्रकरण में पुलिस द्वारा प्रारंभिक संज्ञान लेने के बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक निष्क्रियता की ओर संकेत करता है. वहीं टाटा स्टील के लैंड डिविजन और लीगल सेल की सार्वजनिक चुप्पी भी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है. आमतौर पर टाटा लीज क्षेत्र में मामूली अतिक्रमण पर भी त्वरित कार्रवाई की जाती है, लेकिन हाईकोर्ट में लंबित इस मामले में कथित गतिविधियों पर मौन असामान्य माना जा रहा है.
सूत्रों का यह भी दावा है कि राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों के कारण इस पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है. बताया जा रहा है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति, जिसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का करीबी माना जाता है, के संरक्षण में समय कंस्ट्रक्शन प्रालि. और अंजुम के साथ मिलकर विवादित भूखंड को ठिकाने लगाने की तैयारी चल रही है. आरोप यह भी हैं कि इस पूरे खेल में टाटा ग्रुप के कुछ अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में है.
मामले को लेकर पिछली रिपोर्ट में हमारी टीम ने टाटा स्टील लीगल सेल के अधिकारी डीके सिंह से बात की थी उन्होंने बताया कि मामला उनके संज्ञान में है, लेकिन इस पर आधिकारिक बयान टाटा स्टील लैंड डिविजन की ओर से ही दिया जा सकता है. वहीं लैंड डिविजन के अधिकारी अमित सिंह से संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया. उधर खबर प्रकाशित होने के बाद जमीन माफिया सक्रिय हो गए और युद्धस्तर पर विवादित जमीन पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया. सबसे बड़ी बात ये है कि इस प्रकरण में टाटा स्टील प्रबंधन मौन है. मतलब साफ है कि टाटा प्रबंधन रसूख के आगे नतमस्तक है.
तकनीकी दृष्टि से यह मामला केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि टाटा लीज शर्तों के उल्लंघन, बिना अनुमति तृतीय पक्ष को भूमि हस्तांतरण, हाईकोर्ट के आदेशों की संभावित अवमानना, प्रशासनिक निष्क्रियता और संस्थागत चुप्पी जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ा है. यदि न्यायालय के आदेशों का सख्ती से पालन नहीं कराया गया, तो यह भविष्य में टाटा लीज क्षेत्र में अन्य विवादों के लिए एक खतरनाक नजीर बन सकता है.

