गावों को प्रखंड और प्रखंड को जिला मुख्यालय से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना “प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना” की सरायकेला जिले के गम्हरिया प्रखंड में क्या स्थिति है, पहले इन तस्वीरों के जरिए समझने का प्रयास कीजिए.


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खस्ताहाल सड़के आपको अपनी बदहाली की गवाही खुद दे देगा. वैसे ये सड़कें बने अभी तीन- चार साल ही हुए हैं और सड़क अपनी बदहाली की आंसू रो रहा है. आधी- अधूरी जानकारी और सूचना पट्ट के नाम पर खानापूर्ति, जबकि सड़क बनाने वाली एजेंसी को इनका पांच साल तक रखरखाव करना है.
जब अंदर तक पड़ताल किया तो पाया कि यहां दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है. जर्जर हो चुकी ये सड़के प्रधानमंत्री के सपनों के ग्रामीण भारत की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है. वैसे एक गम्हरिया प्रखंड की सड़कों का यह हाल है, बाकी प्रखंडों की सड़कों का क्या हाल होगा, ये तो प्रधानमंत्री और उनके अधिकारी ही जान सकते हैं. वैसे पूरे मामले पर विभाग के वरीय अधिकारियों की चुप्पी ने इतना तो साफ कर दिया है, कि “प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना” अधिकारियों से लेकर संवेदक तक के लिए मोटी कमाई का जरिया बन कर रह गया है. हाल ये है कि इस योजना के तहत जितनी भी सड़कों का निर्माण हुआ वर्तमान में सारी सड़कें चंद दिनों में ही खस्ताहाल हो गई. सड़क की ऊपरी परत ना सिर्फ छिल गई है ,बल्कि जगह-जगह गड्ढे भी उभर आए हैं.
हरिभंजा से विश्रामपुर तक 3.30 किमी सड़क 19/ 09/ 2017 से निर्माण कार्य शुरू हुआ जो 03/ 04/ 2018 को पूर्ण हुआ. शिलापट्ट पर योजना के लागत से सम्बंधित सूचना नदारत
बिकानी से भदुआगोड़ा तक 3.320 किमी. लागत 102.591 लाख, पांच वर्ष तक रखरखाव के लिए अलग से 4.627 लाख रुपए स्वीकृत किये गए. योजना कब शुरू हुई सब समाप्त इसकी विवरणी गायब. रखरखाव पर कितना खर्च किया गया, वर्षवार ब्यौरा गायब.
इसी तरह बालीगुमा से बीरबांस तक 1.625 किमी लंबाई की सड़क बनी, जिसकी लागत 67.07 लाख, पांच वर्षों के लिए रखरखाव के लिए स्वीकृत राशि 6.52 लाख यह सड़क 18/ 02/ 2017 से शुरू हुई, 17/ 10/ 2017 को पूर्ण हुई एक बार मेंटेनेंस भी हुआ, दुबारा नहीं. सड़क खस्ताहाल स्थिति में है सुध लेने वाला कोई नहीं. आखिर मेंटेनेंस के पैसे गए तो कहां गए.
इस संबंध में जब गहन पड़ताल की गई तो सरायकेला जिले के गम्हरिया प्रखंड में पाया गया कि संवेदको द्वारा स्थानीय लोगों को योजना के प्राक्कलन संबंधी कोई जानकारी ही नहीं दी गई और ना ही कार्यस्थल पर इससे संबंधित जो बोर्ड लगाए गए हैं, उसमें ही कुल प्राक्कलन इत्यादि की जानकारी ही अंकित है.
स्थानीय लोगों के मुताबिक निर्माण के दौरान ही संवेदक द्वारा मनमानी की गई और घटिया गुणवत्ता वाले चिप्स, अलकतरा इत्यादि के प्रयोग ने सड़क का बंटाधार कर दिया. अब जरा इनके लगाए साइन बोर्ड पर ध्यान दिया जाए तो स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है. इन आधे अधूरे साइन बोर्ड पर अंकित तथ्य बंदरबांट और योजना में हुई सरकारी राशि की बंदरबांट और लूट खसोट की पोल खोल रहे हैं.
जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत संवेदको को यह भी उत्तरदायित्व दिया गया था कि ,सड़क के निर्माण की तिथि से 5 वर्ष तक उन्हें ही मेंटेनेंस का काम करना था और बकायदा इसके लिए राशि भी निर्धारित की गई थी I लेकिन इन 5 वर्षों में संवेदको द्वारा सड़क के रखरखाव के लिए क्या किया गया और कितनी राशि खर्च की गई सारा डाटा वर्ष वार साइन बोर्ड पर भी अंकित किया जाना था, लेकिन ना तो संवेदकों ने मेंटेनेंस के प्रति रुचि दिखाई और ना ही साइन बोर्ड पर इसे अंकित करने की जहमत ही उठाई. स्थानीय लोगों का आरोप है, कि मेंटेनेंस के मद में भी लाखों की राशि विभाग से प्राप्त कर ली गई, लेकिन 5 वर्षों में कभी भी संवेदक के कोई भी कर्मचारी पूरे क्षेत्र में नजर ही नहीं आए.
मेंटेनेंस तो दूर की बात है. नतीजा सड़क की दुर्दशा हो गई और इस महत्वाकांक्षी योजना की महत्ता पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया. ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी प्रशासन के आला अधिकारियों को नहीं है, बल्कि ग्रामीणों की माने तो सब कुछ सेटिंग- गेटिंग से ही संपन्न हो रहा है. ऐसे में ग्रामीण अगर अपनी फरियाद लेकर जाएं तो फिर जाएं कहां !
