सरायकेला (प्रमोद सिंह) सरायकेला में रविवार को संतान की लंबी उम्र व सुख- समृद्धि के लिए महिलाओं ने जिउतिया व्रत रखा. 24 घंटे से अधिक का निर्जला उपवास रखकर जियूतवाहन भगवान की पूजा- अर्चना की. रविवार की अहले सुबह उठकर पूजा कर निर्जला व्रत का संकल्प लिया. शहर के मंदिरों में व्रतियों ने पूजा-अर्चना की कथा सुनी प्रखंडों में भी महिलाओं ने जिउतिया व्रत रखा.

यह व्रत प्रतिवर्ष आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. महिलाएं 24 घंटे का निर्जला उपवास रखकर पूजा अर्चना करती हैं. महिलाओं द्वारा जियूत वाहन भगवान से अपने अपने पुत्रों की दीर्घायु होने की कामना की जाती है.
महाभारत काल से जुड़ी हुई है जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा
हर साल आश्विन महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवितपुत्रिका व्रत किया जाता है. इस व्रत को जितिया, जिउतिया, जीमूत वाहन व्रत आदि नामों से जाना जाता है. माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत अपनी संतान खासतौर से पुत्र की लंबी आयु और सुखमय जीवन के आशीर्वाद के लिए रखती हैं. इस व्रत के दौरान कई नियमों का पालन किया जाता है. जीवित्पुत्रिका व्रत का संबंध महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है और इस व्रत के दिन इससे जुड़ी कथा सुनने का भी खास महत्व है. महाभारत युद्ध में पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत क्रोधित था. मन में बदले की भावना लेकर वह पांडवों के शिविर में घुस गया. शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे. अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला और वह सभी द्रौपदी की पांच संतानें थीं. अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली. क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे बच्चे को भी ब्रह्मास्त्र से मार डाला.
ऐसे में भगवान कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा के गर्भ में पल रही अजन्मी संतान को दे दिया और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुन: जीवित कर दिया.
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से गर्भ में ही दोबारा जीवित होने वाले इस बच्चे के कारण इस व्रत को जीवित्पुत्रिका नाम दिया गया. उस समय से ही संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए हर साल जितिया व्रत रखने की परंपरा शुरू हो गई.
