सरायकेला/ Pramod Singh विश्वप्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य की मौलिकता और परंपरा को लेकर सरायकेला राजपरिवार ने गंभीर चिंता जताई है. सरायकेला राजपरिवार के सदस्य और श्री कलापीठ के संरक्षक राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने प्रेस वार्ता में कहा कि 13 अप्रैल को मनाया जाने वाला चैत्र पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सरायकेला छऊ की आत्मा और सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है. इसे महज एक सरकारी ‘इवेंट’ में बदल देना इस मिट्टी की संस्कृति और परंपरा के साथ अन्याय है.

प्रेस वार्ता में उन्होंने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासन चैत्र पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को समझने में विफल रहा है. यदि प्रशासन को केवल नृत्य का प्रदर्शन कराना है तो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस यानी 29 अप्रैल सबसे उपयुक्त अवसर हो सकता है. लेकिन छऊ को उसकी परंपरा और धार्मिक तिथि से जोड़कर देखने के बजाय उसे एक सरकारी कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत करना सरायकेला की सांस्कृतिक पहचान के साथ खिलवाड़ है.
उन्होंने कहा कि छऊ केवल नृत्य नहीं बल्कि सरायकेला की लोकसंस्कृति, आस्था और पहचान का प्रतीक है. इसे बचाना समाज और प्रशासन दोनों की साझा जिम्मेदारी है. यदि इसे केवल मंचीय मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां इसकी असली पहचान से वंचित रह जाएंगी.
सरायकेला छऊ नृत्य का इतिहास करीब 300 वर्षों से अधिक पुराना माना जाता है. इसका उद्भव प्राचीन मार्शल आर्ट ‘परिखंडा’ के अभ्यास से हुआ था, जिसमें पारी यानी ढाल और खंडा यानी तलवार के साथ युद्ध कौशल का अभ्यास किया जाता था. पारंपरिक रूप से यह नृत्य भगवान शिव और शक्ति की उपासना से जुड़ा हुआ है. चैत्र पर्व के दौरान 13 दिनों तक विशेष अनुष्ठान और तपस्या की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें कलश स्थापना और जातरा घट का विशेष महत्व होता है.
इतिहास के अनुसार सरायकेला राजपरिवार ने इस कला को संरक्षण और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1930 के दशक में राजा विजय प्रताप सिंहदेव ने छऊ नृत्य को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, जिसके बाद इस कला को वैश्विक पहचान मिलने लगी. सरायकेला शैली की खासियत इसके काव्यात्मक और भावप्रधान मुखौटे हैं, जो पात्रों के सूक्ष्म भावों को जीवंत रूप से प्रस्तुत करते हैं.
वर्ष 2010 में यूनेस्को ने छऊ नृत्य को ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा दिया था. बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर यह कला अब सरकारी फाइलों और तीन दिवसीय ‘छऊ महोत्सव’ तक सीमित होती जा रही है.
राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने चेतावनी दी कि यदि छऊ के मूल स्वरूप और इससे जुड़ी पारंपरिक तिथियों का सम्मान नहीं किया गया तो यह कला अपनी असली पहचान खो देगी. उन्होंने प्रशासन से अपील की कि कलाकारों की समस्याओं पर ध्यान दिया जाए और चैत्र पर्व के पारंपरिक अनुष्ठानों को महोत्सव के शोर-शराबे से अलग रखते हुए इसकी पवित्रता और परंपरा को बनाए रखा जाए.

