DESK: सहारा मामले में पिछले दिनों जिस तरह से झारखण्ड पुलिस ने कार्रवाई की है इसको लेकर विवाद छिड़ गया है. जानकार इसे शीर्ष अदालत का अवमानना मान रहे हैं. इसके साथ ही सरकार की किरकिरी भी हो रही है. विदित हो कि पिछले दिनों झारखंड सीआईडी ने रांची के मंडल प्रमुख संजीव कुमार को बिहार से गिरफ्तार किया है. उनपर आरोप है कि 400 करोड़ का भुगतान रांची जोन में नहीं किया गया. जबकि यह मामला शीर्ष अदालत में चल रहा है.

केंद्र सरकार के अनुरोध पर शीर्ष अदालत ने पांच हजार करोड़ सहारा- सेबी खाते से निवेशकों को भुगतान करने का निर्देश जारी किया गया. इसके लिए सहारा- सीआरसीएस पोर्टल के जरिए निवेशकों का भुगतान शुरू किया गया. जो पूर्ण रूप से वितरित किया जा चुका है. इसके माध्यम से झारखंड के निवेशकों को महज 300 करोड़ का भुगतान ही किया जा सका. इस बीच झारखंड के डीजीपी के आदेश पर राज्य के सभी कार्यालयों को बंद कर दिया गया. इससे निवेशकों का सत्यापन प्रभावित हुआ. जबकि झारखंड के निवेशकों का 32 हजार करोड़ फंसा है.
जानकार मानते हैं कि सरकारी मशीनरी के अदूरदर्शिता के कारण झारखंड के निवेशकों का भुगतान प्रभावित हो रहा है इसका नुकसान सरकार को उठाना पड़ सकता है. बता दें कि विस चुनाव के दौरान झामुमो ने अपने मेनिफेस्टो में सहारा के निवेशकों का भुगतान कराने का वायदा किया था, सरकार बनते ही उल्टा निवेशकों के भुगतान पर ग्रहण लगा दिया.
क्या साहरा मामले में न्याय हो रहा है ?
पिछले करीब 13 साल से चल रहे सहारा- सेबी विवाद की वजह से देश का एक बड़ा वर्ग प्रभावित हुआ है.इसमें करीब 13 करोड़ निवेशक और 12 लाख रोजगार प्रभावित हुआ है. साथ ही एक हंसता खेलता संस्थान बर्बाद हो चुका है. इसपर देश में ज़ब भी बहस होगा केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट, देश की तमाम जांच एजेंसियों के साथ पत्रकरिता को कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा. देश की जनता और सहारा के निवेशक जानना चाहते हैं कि आखिर उनकी गाढ़ी कमाई कहां है ? पिछले 13 साल से शीर्ष अदालत यह पता लगा पानी में विफल रही है कि सहारा ने अपनी संपत्ति को लेकर जो हलफनामा दिया है वह सही है या गलत. इसके पीछे क्या कारण है यह भी जांच का विषय है. बतौर सहारा उसकी संपत्ति निवेशकों की देनदारी की तुलना में तीन गुणा अधिक है. 3, 4 और 5 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सहारा ने जो हालफनामा शीर्ष अदालत को दिए हैं उसके मुताबिक बरसोवा और एम्बी वैली के संपत्ति का दस्तावेज सौंपा है. साथ ही सेबी के पास 20- 22 संपत्तियों का दस्तावेज भी सौंपा है, जिसका अनुमानित मूल्य करीब 6.50 लाख करोड़ है. जबकि सहारा की कुल देनदारी 2.50 लाख करोड़ की है. सेबी, ईडी, सीबीआई सहित तमाम जांच एजेंसियां सहारा मुख्यालय की खाक छान चुकी है, मगर आज तक सहारा के संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक करने में नाकाम रही है .इसके उलट राज्य- दर- राज्य सहारा के अधिकारियों पर केस दर्ज कर उन्हें जेल भेजने का काम किया जा रहा है. क्या इससे निवेशकों का भुगतान संभव हो सकेगा ? क्या यह निवेशकों को गुमराह करने जैसा मामला प्रतीत नहीं होता है ? यहां गौर करने वाली बात यह है कि पोर्टल के जरिए पांच हजार करोड़ का भुगतान करने में केंद्र सरकार को 2 साल से अधिक का वक्त लग गया. ढाई लाख करोड़ का भुगतान कब तक होगा ? जानकर यह भी मानते हैं कि हाल के दिनों में कई राज्यों में सहारा के जमीन से जुड़े मामले में एफआईआर दर्ज किए गए हैं, जिसमें झारखंड भी शामिल है. आरोप है कि सहारा ने सरकारी दर से कम कीमत पर जमीन बेचा और उससे निजी खर्च किया. यह प्रसंग भी हास्यास्पद है. सहारा के सारे दस्तावेज जब शीर्ष अदालत और सेबी के पास है तो सहारा जमीन कैसे बेच सकता है ? थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि सहारा ने जमीन बेच भी है तो इसमें गलती क्या है ? जो दस्तावेज सेबी और शीर्ष अदालत के पास है उसका आंकलन कर सहारा के देनदारी का हिसाब- किताब कर ले उसके बाद यदि सहारा अपने विवेक से जमीन बेचकर पैसे उठा रही हैं या खर्च कर रही है तो इसके लिए उनके अधिकारियों परेशान करना जरूरी है ? आखिर इतने बड़े संस्थान को चलाने के लिए पैसे कहां से आएंगे क्या केंद्र सरकार या सुप्रीम कोर्ट इसकी जवाबदेही लगी ? वैसे भी मामला मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है तो राज्य की सरकारों की क्या भूमिका है यह समझ से परे है. यही कारण है कि देश का एक बड़ा वर्ग अब यह मानने लगा है कि सहारा मामले में इंसाफ नहीं हो रहा है. जो लोकतंत्र के चारों स्तंभों को कटघरे में खड़ा कर रहा है.
कइयों ने आपदा को अवसर में बदला
इस कालखंड को कई यूट्यूबर्स और सहारा के बागियों ने अवसर बना लिया. भ्रामक और तथ्यहीन खबरें परोस कर न केवल निवेशकों को दिग्भ्रमित किया बल्कि सरकार और सरकारी मशीनरी को भी दिग्भ्रमित किया. बागियों ने झूठे दस्तावेज और भोले- भाले निवेशकों से चंदा उगाही कर लाखों- करोड़ों अर्जित किया. इसके बाद भी समाधान शून्य रहा. सहारा के अधिकारियों को गिरफ्तार करवा कर और सहारा के कार्यालयों को बंद करवा कर क्या निवेशकों का भुगतान हुआ यह निवेशक सुनिश्चित करें. युटयूबर्स के फेक और तथ्यहीन वीडियो देखकर क्या निवेशकों के पैसे मिल गए या उनका समाधान मिल गया ? जानकार मानते हैं कि यह एक प्रोपेगेंडा है इसके पीछे केंद्र और राज्य की सरकारों के साथ सरकारी मशीनरी, मेन स्ट्रीम मिडिया और कहीं न कहीं बोरिंग न्याय प्रणाली की संलिप्तता है. इनकी मंशा यही है कि कानूनी दांव- पेंच में फंसकर सहारा प्रबंधन बैकफुट पर चला जाए और उसकी सारी संपत्तियों को हड़प लिया जाए. मगर सहारा प्रबंधन आज भी अपने निवेशकों के लिए लड़ रहा है जो अपने आप में एक बड़ी बात है. अब देखना यह दिलचस्प होगा कि इस सह- मात के खेल में जीत किसकी होती है.
केंद्र सरकार की विश्वासनीयता पर भी उठने लगे सवाल
पिछले 11 साल से केंद्र में एनडीए की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि विकास पुरुष के रूप में रही है. जनता के साथ किए गए हर वादे को पूरा करने का दावा करते रहे है. मगर इतनी बड़ी त्रासदी पर उनकी चुप्पी कई सवालों को जन्म देने लगा है. सदन में चाहे सत्ता पक्ष के हो या विपक्ष के सांसद लगभग हर सत्र में इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, जवाब यही आता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भुगतान पोर्टल के जरिए कराई जा रही है. मगर यह नहीं कहा जाता है कि भुगतान कब तक होगा. इस जद्दोजहद में हजारों निवेशक और सैकड़ो एजेंट यहां तक कि कभी दुनिया के शीर्ष बिजनेसमैन के रूप में टाइम मैगजीन के कवर पेज पर छाने वाले सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय बदनुमा दाग़ लिए इस दुनिया से रुखसत हो चुके हैं. क्या इसका हिसाब लोकतंत्र का चारों स्तंभ देगा ? इस दौर में ज़ब राज्यों के चुनावी रैलियों में, सदन में, सड़क पर हर तरफ सहारा- सेबी प्रकरण गूंज रहा है और कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता चुप है यह एक यक्ष प्रश्न है जो आने वाला कल चीख- चीख कर पूछेगा. पूछा जाएगा जब सहारा का साम्राज्य लुट रहा था तब न्याय की देवी क्या कर रही थी.

