नई दिल्ली: सहारा- सेबी मामले में सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कुछ लोग आंदोलन और समाजसेवा के नाम पर ग्राहकों को गुमराह कर रहे हैं. उनसे सावधान रहने की जरूरत है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि तथाकथित आन्दोलनजीवी द्वारा आजतक एक रुपए का भुगतान निवेशकों को नहीं दिलाया जा सका है उल्टा निवेशक इनके झांसे में आकर इनके संगठन को चंदा देकर इनकी दुकानदारी चला रहे हैं.

दरअसल, 18 मार्च 2025 को मध्यस्थता + समझौता (सहारा बनाम सेबी, डायरी नंबर-36632/2012) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब यह विवाद अंतिम चरण में है, इसलिए अदालत किसी बाहरी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगी. कोर्ट ने आंदोलनकारियों की सभी आईए याचिकाएं खारिज कर दीं.
सरकार ने राजपत्र के माध्यम से सहारा की चारों सोसायटियों का भुगतान अपने जिम्मे ले लिया है. इसके बावजूद कुछ गैर-सरकारी संगठन (NGO) और व्यक्ति आंदोलन के नाम पर ग्राहकों को ठग रहे हैं.
इन संगठनों का खेल
पहले ये लोग सहारा संस्था से कमीशन और इनकम लेते रहे. अब संस्था विरोधी बनकर दलाली का काम कर रहे हैं. ये गरीब ग्राहकों को ‘मसीहा’ बनने का झूठा दावा कर उनसे आवेदन शुल्क और पैसा वसूल रहे हैं. हाल ही में ब्रेन ऑफ बिहार नामक संगठन ने अपने वीडियो में कहा कि उसने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन लगाने के लिए ग्राहकों से 2000, 3000 और 5000 रुपये तक की राशि ली है. जब भुगतान की प्रक्रिया सरकार और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है तो ऐसे आवेदन का औचित्य क्या है यह बड़ा सवाल है.
ना तो ये लोग ग्राहकों को उनका पैसा दिलवा पाए हैं और ना ही अब तक वसूली गई राशि का ब्याज देने की कोई जिम्मेदारी लेते हैं.
हकीकत यह है कि अब तक सहारा सीआरसीएस पोर्टल के माध्यम से लगभग 5000 करोड़ रुपये का भुगतान हो चुका है, लेकिन इन संगठनों ने आज तक किसी भी ग्राहक को सीधे एक रुपया भी नहीं दिलवाया है. इससे साफ हो गया है कि यह पूरा खेल सिर्फ भुगतान दिलवाने के नाम पर अपनी दुकान चलाने का है ताकि इनकी कमाई बनी रहे. समझदारों के लिए इशारा ही काफी है. निवेशक सतर्क रहें न्यायपालिका और संस्था पर भरोसा रखें. क्योंकि संस्था यदि पलायनवादी होती तो हिंदुस्तान के इतिहास के इतने बड़े मुकदमें में अपने निवेशकों के लिए खड़ा नहीं रहती.
एक ऐसा मुकदमा जिसमें सामना सीधे सिस्टम और सरकारी मशीनरी के साथ था. इस मुकदमे में संस्था ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया. अब उम्मीद की किरण नजर आने लगी है. न्याय की जीत जरूर होगी. हां इतना जरूर है कि न्यायपालिका का इतिहास जब भी लिखा जाएगा उसमें सहारा- सेबी विवाद का अध्याय जरूर जुड़ेगा.

