सरायकेला: जिले के निकाय चुनाव ने भाजपा की अंदरूनी सियासत को खुलकर सामने ला दिया है. सबसे ज्यादा चर्चा आदित्यपुर नगर निगम की मेयर सीट को लेकर रही, जहां भाजपा समर्थित संजय सरदार की जीत ने कई राजनीतिक संदेश दे दिए हैं.

*अर्जुन मुंडा की सक्रियता बनी गेम चेंजर*
पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा पूरे चुनावी अभियान में सक्रिय दिखे. टिकट वितरण से लेकर रणनीतिक प्रबंधन तक उन्होंने सीधी भूमिका निभाई. अंतिम समय में प्रत्याशी चयन, भीतरखाने की नाराजगी और बगावत के बावजूद संगठन को एकजुट रखना आसान नहीं था. इसके बावजूद आदित्यपुर में जीत दर्ज होना इस बात का संकेत है कि अर्जुन मुंडा अब भी संगठन के भीतर निर्णायक प्रभाव रखते हैं. इसे उनके राजनीतिक पुनरुत्थान के रूप में देखा जा रहा है.
*सरायकेला में भाजपा की फिसलन*
वहीं सेरायकेला नगर पंचायत अध्यक्ष पद पर झामुमो समर्थित उम्मीदवार की जीत ने भाजपा की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए. यहां भाजपा समर्थित प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे. यह परिणाम स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और असंतोष का नतीजा माना जा रहा है.
*चंपाई सोरेन की खामोशी चर्चा में*
पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन की भूमिका इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा में रही. प्रत्याशी चयन को लेकर असहमति और सक्रिय प्रचार से दूरी ने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है. उनके समर्थित उम्मीदवारों की हार ने उनके राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. भाजपा में शामिल होने के बाद लगातार चुनावी झटके उनके लिए चुनौती बन सकते हैं.
*बगावत बनाम संगठन*
आदित्यपुर में समानांतर दावेदारों के मैदान में उतरने से भाजपा को आंतरिक चुनौती मिली. बावजूद इसके, अंततः कैडर वोट अधिकृत प्रत्याशी के साथ गया. यह संगठनात्मक मजबूती का संकेत है. दूसरी ओर, सरायकेला में यही एकजुटता नजर नहीं आई.
*पूर्व डिप्टी मेयर अमित सिंह उर्फ़ बॉबी सिंह ने खोया मुंडा का भरोसा*
आदित्यपुर नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर अमित सिंह उर्फ़ बॉबी सिंह जो हाल के दिनों में अर्जुन मुंडा के करीबी के रूप में देखे जा रहे थे नगर निगम चुनाव के दौरान उनकी भूमिका ने अर्जुन मुंडा के भरोसे को डिगा दिया है. दरअसल भाजपा के बागी बोरजो राम हांसदा ने अपनी पत्नी बिनोती हांसदा को मेयर चुनाव लड़ाया. बोरजो बॉबी सिंह के खास माने जाते हैं. अर्जुन मुंडा चाहते थे कि बिनोती बैक हो जाए और संजय सरदार के लिए को अपना समर्थन दे मगर बॉबी बोरजो राम हांसदा को साधने में नाकाम रहे. यही नहीं बॉबी सिंह खुद संजय सरदार के लिए प्रचार- प्रसार से दूर रहे और खुद का ध्यान वार्ड 17 में पार्षद पद का चुनाव लड़ने पर केंद्रित कर दिया. उनकी पूरी मशीनरी वार्ड 17 में सक्रिय रही. जिसमें बीजेपी के कई बड़े नेता शामिल रहे. हालांकि वे पार्षद पद का चुनाव भी बुरी तरह से हार गए.
*आगे क्या ?*
यह चुनाव साफ संकेत देता है कि भाजपा के भीतर नेतृत्व और प्रभाव की रेखाएं फिर से खींची जा रही हैं. अर्जुन मुंडा की सक्रियता ने उन्हें एक बार फिर केंद्र में ला दिया है. वहीं चंपाई सोरेन को पार्टी के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी.
निकाय चुनाव भले स्थानीय हों, लेकिन इनके परिणाम आने वाले बड़े चुनावों की भूमिका तैयार करते हैं. सरायकेला का संदेश स्पष्ट है. संगठन मजबूत तो जीत तय. गुटबाजी हावी तो नुकसान निश्चित.

