खरसावां: पदमपुर ग्राम स्थित जय मां काली पूजा कमिटी इस वर्ष मां काली आराधना के 128 वर्ष पूरे कर रही है. यह परंपरा सन् 1897 में शुरू हुई थी, जब खरसावां सियासत के तत्कालीन राजा ठाकुर महेन्द्र नारायण सिंहदेव के शासनकाल में पदमपुर के जमींदार वैद्यनाथ सिंह देव ने मां काली के आविर्भाव के बाद मंदिर की स्थापना की थी. उस दिन से लेकर आज तक यह पूजा परंपरा निर्बाध रूप से जारी है.

मां काली के आविर्भाव के बाद जमींदार वैद्यनाथ सिंहदेव ने स्वयं मंदिर निर्माण कराया और पूजा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाली. उनके निधन के बाद उनके पुत्र नीलकंठ सिंहदेव ने पूजा परंपरा को आगे बढ़ाया और इसकी निरंतरता के लिए “षोल आना” नामक पूजा समिति का गठन किया. उन्होंने अध्यक्षता का अधिकार अपने परिवार के लिए सुरक्षित रखा ताकि पूजा परंपरा पीढ़ियों तक बनी रहे.
पूजा व्यवस्था की विशेषता यह है कि इसमें समाज के हर वर्ग की सहभागिता सुनिश्चित की गई है. मां के आदेशानुसार अलग-अलग समाजों को विशिष्ट जिम्मेदारियाँ सौंपी गई थीं, जो आज भी उसी श्रद्धा और परंपरा से निभाई जा रही हैं. खरसावां के मालाकार समाज के श्री शिव मालाकार को फूल और बेलपत्र लाने की जिम्मेदारी दी गई थी. पदमपुर के गौड़ समाज को मंदिर की साफ-सफाई और बकरे की बली चढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई. नाई समाज को पूजा के आमंत्रण का कार्य, धोबी समाज को मां के वस्त्र धोने की जिम्मेदारी दी गई.
कुम्हार समाज मिट्टी के दीप और पात्र तैयार करता है, जबकि सुंडी समाज रात्री जागरण की व्यवस्था संभालता है. आदिवासी (हो) समाज मां की विदाई के समय पारंपरिक डुवंग नाच कर मां को विदा करता है. तेली समाज मूर्ति विसर्जन की जिम्मेदारी निभाता है और हरिजन समाज बांस के ठाट और बाजा बनाने का कार्य करता है.
इसी ऐतिहासिक परंपरा के तहत इस वर्ष भी शरद पूर्णिमा (कुमार पुनेई) के मौके पर मां काली की प्रतिमा निर्माण हेतु विशेष पूजा का आयोजन किया गया. पदमपुर काली मंदिर में पुजारी विमला षाडंगी ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिमा निर्माण की पूजा की. आगामी 20 अक्टूबर को मां काली की पूजा होगी, जो सात दिनों तक चलेगी.
सात दिवसीय भव्य आयोजन के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं. मेला आयोजन पर चर्चा के दौरान समिति के अध्यक्ष सुब्रत सिंहदेव, अजित सिंहदेव, सुकरू मंडल, बुतरू मंडल, राजेन मंडल, अक्षय मंडल समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे. जय मां काली पूजा कमिटी पदमपुर इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रखने के लिए संकल्पित है.

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