खरसावां : खरसावां के संतारी गांव स्थित हरि संकीर्तन मंदिर परिसर में भागवत कथा का आयोजन किया गया है. इस कथा को सुनने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. मध्य प्रदेश के अमरकंटक धाम से पधारे कथावाचक राघवेंद्र आचार्य महराज ने भागवत कथा के दूसरे दिन श्रीमद्भागवत महापुराण के विभिन्न प्रसंगों को तर्को के साथ समझाया. कथा के दौरान बताया गया कि जीवन में श्रीमद्भागवत कथा हमें क्या सिखाती है आखिर ऐसे आयोजनों से क्या लाभ होता है. इन सवालों के जवाब हमें भागवत शब्द के विच्छेद से पता चलता है.


भ से भक्ति, ग से ज्ञान, व से वैराग्य और त से त्याग यानी जिस कथा में भक्ति, ज्ञान, वैराग्य सिखाया जाये उसे श्रीमद भागवत कथा कहते हैं एवं व्यक्ति को त्याग, तपस्या के मार्ग से मोक्ष मिल सके. मनुष्य कलियुग में केवल नाम संकीर्तन के माध्यम से ही भगवान को पा सकते हैं, उन्हें सतयुग की तरह हजारों वर्षों की तपस्या या त्रेतायुग की तरह विशाल यज्ञ या द्वापर युग की तरह विशाल दान की आवश्यकता नहीं है, कलियुग में वे केवल भगवान के पवित्र नामों का जाप करके ही भगवान को प्राप्त कर सकते हैं.
द्वापर युग समाप्त होने और कलयुग के शुभारंभ की कथा सुनाई. कथा में बताया कि राजा परीक्षित ने शिकार के दौरान देखा कि एक पैर वाले बैल और गाय को कोई पीट रहा था. राजा परीक्षित क्रोधित हुए और उस व्यक्ति से कहा कि तुझे मृत्युदंड मिलना चाहिए. राजा का क्रोध देख कलयुग उनके चरणों में क्षमा-याचना करने लगा. राजा इस माया को समझ गए कि एक पैर वाला बैल धर्म है और गाय के रूप में धरती मां हैं. मारने वाला कलयुग है. राजा ने कलयुग को राज्य की सीमा से बाहर चले जाने का आदेश दिया.
कलयुग ने कहा कि महाराज आपका शासन पूरी धरती पर है, ऐसे में मैं कहां जाऊं. आप ही कुछ उचित स्थान दें जहां मैं रह सकूं. कलयुग के गिड़गिड़ाने पर राजा परीक्षित ने उसे धरती पर रहने के लिए जुआं, मदिरा, परस्त्रीगमन और हिंसा जैसी चार जगह दे दी. इस पर कलयुग ने प्रार्थना की कि ये सभी तो ऐसे स्थान हैं जहां बुरे व्यक्ति जाते हैं, कोई एक ऐसा स्थान भी दीजिए जो अच्छा माना जाता है. इस पर राजा ने उसे सोने (स्वर्ण) में रहने की अनुमति दे दी. कलयुग को मौका मिल गया और वह सूक्ष्म रूप में राजा के सिर पर स्वर्ण मुकुट में बैठ गया.
राजा शिकार के लिए आगे बढ़े तो प्यास लगी। वे शमिक ऋषि के आश्रम में गए और जल के लिए आवाज लगाई. ऋषि शमिक ध्यान में लीन थे. सिर पर कलयुग के बैठे होने की वजह से राजा परीक्षित को लगा कि ऋषि उनका अपमान कर रहे हैं. वे क्रोधित हो गए और ऋषि शमिक के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया. उसी समय नदी से स्नान कर लौट रहे ऋषि शमिक के पुत्र श्रृंगी ने जब पिता के गले में मरा सांप देखा तो राजा परीक्षित को श्राप दे दिया कि सात दिनों के भीतर तक्षक नाग के डसने से उसकी मौत हो जाएगी.
