खरसावां: स्थित मॉडल महाविद्यालय में ‘पर्यावरणीय संरक्षकता: परंपरा, तकनीकी व भविष्य’ विषय पर दो दिवसीय अंतर विषय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कोल्हान विश्वविद्यालय के सीसीडीसी डॉ. आरके. चौधरी ने असंतुलित नगरीकरण, पारिस्थितिकी तिरोहित तकनीकी विस्तार और औद्योगिक अपशिष्ट कुप्रबंधन के कारण बढ़ते पर्यावरण संकट पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जनमानस को पर्यावरण हितैषी परंपराओं की ओर लौटना होगा.

विशिष्ट अतिथि एवं एसकेएमयू दुमका के पूर्व कार्यवाहक कुलपति डॉ. विमल कुमार सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक जीवन शैली में निहित पर्यावरणीय चेतना पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि वर्तमान संकट पर्यावरणीय संरक्षकता की अमूर्त भारतीय विरासत से विचलन का परिणाम है. भारतीय सभ्यता में विकास और पर्यावरण हमेशा एक- दूसरे के पूरक रहे हैं.
नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीके पाणि ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि पर्यावरणीय संतुलन और सकारात्मक बदलाव के लिए लोक आचरण में प्रकृति की प्राथमिकताओं को स्थान देना आवश्यक है. उन्होंने कहा कि प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध ही दीर्घकालिक मानवता का आधार है.
संगोष्ठी के दूसरे दिन आईसीटी आधारित शोध पत्र प्रस्तुत किए गए. इस दौरान डॉ. मुस्ताक अहमद, डॉ. एके पॉल और अन्य विद्वानों की उपस्थिति रही. राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मॉडल महाविद्यालय खरसावां के प्राचार्य डॉ. उमा शंकर सिंह की अध्यक्षता में हुआ. संयोजक डॉ. राजेश कुमार मंडल और समन्वयक पंकज कुमार श्रीवास्तव रहे.
कार्यक्रम में रिसोर्स पर्सन के रूप में डॉ. अभिषेक शर्मा और डॉ. किशोर कुमार ओझा शामिल हुए. आयोजन सचिव की भूमिका एलबीएसएम कॉलेज जमशेदपुर के वाणिज्य विभागाध्यक्ष डॉ. विजय प्रकाश ने निभाई. संगोष्ठी में प्रान की निदेशक श्रीमती संगीत कुमारी सहित कई विद्वानों की सक्रिय भागीदारी रही.

