रांची: सरकार की योजनाएं पोस्टरों में मुस्कराती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में मां बनने जा रही महिलाओं को लकड़ी की कुर्सीयों पर ढोया जाता है. ना एम्बुलेंस, ना सड़क, ना कोई सुविधा. ये सिर्फ खबर नहीं, सच्चाई का आईना है. जहां एक रोशनी मड़की हर दिन मां बनने से पहले मरने जैसा दर्द झेलती है. और सरकार की चुप्पी, जनता की चीख से बड़ी हो जाती है. क्या यही है नया भारत ? क्या यही है महिला सशक्तिकरण ?

खूंटी जिला के रनिया प्रखंड अंतर्गत बेलकीदुरा पहान टोली में आज इंसानियत को कांधों पर ढोया गया. गर्भवती महिला रोशनी मड़की की पीड़ा ने पूरे गांव को हिला दिया. आज उसे अस्पताल नहीं, बल्कि जंगल की पगडंडी पर एक कुर्सी पर ले जाया गया. चार लोगों ने मिलकर लकड़ी और रस्सियों से बनी कुर्सी को उठाया, और रोशनी को उस पर बैठाकर उबड़- खाबड़ रास्तों से लेकर चले. हर झटका उसकी कोख में तीर बनकर चुभ रहा था. हर कदम उसकी कराह से भरा था. जंगल, कीचड़, पत्थर और कांटों के बीच से गुजरती रोशनी की ये यात्रा एक पीड़ा भरी परीक्षा बन चुकी थी. उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी, सिर्फ दर्द था — असहनीय दर्द. कभी वो भगवान को पुकारती, कभी मां को. लेकिन कोई मदद नहीं थी. आसपास सिर्फ वो लोग थे जो उतने ही बेबस थे, जितनी वो. आप भी देखिये झारखंड की एक बेटी का तड़पता रूप…

