DESK राजा जब कान के कच्चे हो जाए तो उसका राज लूटना तय है. ऐसा ही हल इन दिनों झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन का हो रहा है. दरअसल चंपई सोरेन के सियासी सल्तनत का पतन उसी दिन से शुरू हो गया जिस दिन उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन छोड़ भाजपा का दामन थामा. वैसे गिरते- पड़ते चंपई सोरेन ने अपनी लाज तो बचा ली मगर घाटशिला से अपने पुत्र और अपने खरसावां से अपने शिष्य यानी सोनाराम बोदरा को नहीं जिता सके.

दरअसल चंपाई सोरेन को इस बात का आभास ही नहीं लगा कि राज्य में बीजेपी अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी है. मगर राजनीति के दिग्गज चंपई सोरेन इस बात को कैसे भांप नहीं सके कि जहां पहले से ही चार- चार मुख्यमंत्री अपनी खोई सियासी जमीन बचाने के लिए एक दूसरे का टांग खींच रहे हैं वहां उनकी जमीन में खाद- पानी कौन देगा. गनीमत रही कि सरायकेला विधानसभा सीट से चुनाव जीतने में चंपई सोरेन के अपने करीबियों का हाथ रहा नहीं तो सरायकेला सीट भी उन्हें गंवानी पड़ती. खैर यह तो अब अतीत की बातें हो चुकी है. मगर राजनीतिक के जानकार मानते हैं कि चंपई सोरेन का यह अंतिम पारी चल रहा है. क्योंकि अब चंपई सोरेन अपनी अंतरात्मा की नहीं बल्कि अपने इर्द- गिर्द विचरण कर रहे चाटुकार और चापलूसों की बातों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं यही कारण है कि अब चंपई सोरेन का राजनीत पतन की ओर जा रहा है.
अपने पुत्रों से ज्यादा भरोसेमंद चापलूसो ने चंपई सोरेन के राजनीति के अंतिम पारी को और कमजोर बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. चुनाव के बाद चंपाई संथाल समाज को एकजुट करने की कवायद में जुट गए मगर बीजेपी का कोई बड़ा नेता ना तो घुसपैठ के मुद्दे पर बोल रहा है ना ही धर्मांतरण और संथाल समाज को एकजुट करने की बात कर रहा है. यहां तक कि चंपाई पार्टी कार्यक्रमों से भी खास दिलचस्पी नहीं लेते हैं. उनका अपना एजेंडा है और वे उसी एजेंडे पर काम कर रहे हैं. भोगनाडीह की घटना ने कोल्हान टाईगर की छवि को थोड़ी धूमिल की है. चंपाई की पहचान एक जिद्दी और संघर्ष शील नेता के रूप में होती रही है. उन्होंने प्रचंड मोदी लहर में भी बीजेपी को सरायकेला सीट से चुनाव जीतने नहीं दिया. भोगनाडीह से हूल पार्ट- 2 का उलगुलान का नारा देने वाले चंपाई को अचानक से क्या हुआ कि बगैर भोगनाडीह गए आधे रास्ते से ही लौट गए ? बताया जा रहा है कि प्रशासन ने पूर्व मुख्यमंत्री को भोगनाडी में सभा करने की अनुमति नहीं दी उसके बाद जो घटना हुई उसने न केवल चंपई सोरेन के राजनीतिक कैरियर को ग्रहण लगा दिया बल्कि चंपई को करीब से जानने वालों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.
भोगनाडी में जिस तरह से गरीब आदिवासियों और शहीद सिदो- कान्हू के वंशजों के साथ मारपीट, लाठी चार्ज और आंसू गैस छोड़े जाने की घटना हुई इस पर सियासी बहस छिड़ गया है. उससे ज्यादा बहस पूर्व मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया प्रभारी सुधीर कुमार और उड़ीसा के एक युवक गणेश मंडल की गिरफ्तारी को लेकर छिड़ा हुआ है.
आरोप है कि भोगनाडीह हिंसा मामले के दोनों मास्टरमाइंड है. यह भी आरोप है कि उनके पास से पुलिस ने हथियार और कारतूस वगैरह भी बरामद किए हैं. सुधीर को करीब से जानने वालों को यह बात हजम नहीं हो रही है. उससे ज्यादा इसकी भी चर्चा हो रही है कि चंपई सोरेन के रहते सुधीर की गिरफ्तारी कैसे हो गई ? सुधीर की गिरफ्तारी ऐसे क्षेत्र से हुई है जहां बीजेपी के फायर ब्रांड सांसद निशिकांत दुबे का गढ़ है. आमतौर पर सुधीर मिलनसार प्रवृत्ति का युवक रहा है. उसकी गिरफ्तारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अब देखना है यह दिलचस्प होगा कि इस पूरे प्रकरण में बीजेपी का क्या स्टैंड रहता है. फिलहाल तो बीजेपी इस मुद्दे को लेकर सियासी चक्रव्यूह रच रही है, मगर इसका लाभ पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को कितना मिलेगा यह गौर करने वाली बात होगी. सूत्रों की माने तो चंपई सोरेन के करीबियों ने उन्हें वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. समय रहते चंपई सोरेन यदि अपने आस्तीन में छिपे सांपों की नस्ल को नहीं पहचानेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब वही सांप फन उठाकर उन्हें डस लेंगे. सूत्रों की माने तो इसकी व्यूह रचना और पृष्ठभूमि भी तैयार कर ली गई है.

