Editorial: झारखंड में भारतीय जनता पार्टी अंतर्कलह के कारण सत्ता से कोसों दूर जा चुकी है, बावजूद इसके पार्टी के अंदरखाने में अंतर्कलह थमने के बजाय लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं. प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद आदित्य साहू भी उतने प्रभावशाली नजर नहीं आ रहे हैं. प्रदेश से लेकर बूथ कमेटियों के बीच गहरी खाई बन चुकी है. पार्टी का जमीनी नेता और कार्यकर्ता त्राहिमाम कर रहा है ऊपर बैठे मठाधीश एक दूसरे का पर कुतरने में जुटे हैं. पांच- पांच पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा की शोभा बढ़ा रहे हैं मगर सबकी “अपनी डफली- अपनी राग” चल रही है.

चाहे बाबूलाल मरांडी हो, अर्जुन मुंडा हो, रघुवर दास, मधु कोड़ा अथवा चंपाई सोरेन, सभी सूरमा एकदूसरे को नीचा दिखाकर अलाकमान को खुश करने में जुटे हैं. वैसे जमीन पर सारे सूरमा धराशाई हो चुके हैं. चंपई सोरेन और बाबूलाल मरांडी ने किसी तरह पार्टी का झंडा अपने- अपने क्षेत्र में बुलंद रखा है, मगर अर्जुन मुंडा और रघुवर दास के बीच शुरू हुआ विवाद सरयू राय और रघुवर दास तक आकर इस तरह विस्फोटक हुआ कि पार्टी सांगठनिक रूप से छिन्न भिन्न हो चुका है. भले राज्य के पांच- पांच पूर्व मुख्यमंत्री बीजेपी की शोभा बढ़ा रहे हैं मगर आपसी खेमेबंदी ने पार्टी का बंटाधार कर दिया है. भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने के कारण मधु कोड़ा ने खुद को पश्चिम सिंहभूम की राजनीति में सीमित कर लिया है. दो- दो विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हार के बाद अर्जुन मुंडा अपनी पत्नी को भी विधानसभा चुनाव में हरवा चुके हैं. उनकी प्रतिष्ठा में जबरदस्त गिरावट हो चुकी है. अर्जुन मुंडा अब चंपई सोरेन के पीछे पड़ गए हैं.
अंदरखाने की माने तो पिछले विधानसभा चुनाव उसके बाद संपन्न हुए घाटशिला उपचुनाव में अर्जुन मुंडा खेमा ने चंपई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन को हरवाने का काम किया है. हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि हमारे पास नहीं है मगर पार्टी के अंदर खाने में इसकी चर्चा जोर- शोर से है.
ऊपर की लड़ाई के चक्कर में जमीनी नेता और कार्यकर्ता पिसते चले जा रहे हैं. ऊपर वाले अपने प्रभाव और रसूख से जिला से लेकर मंडल और बूथ तक अपने लोगों को सेट कर अपनी राजनीति चमका रहे हैं. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है. अभी आदिवासी चेहरा के रूप में चंपई सोरेन सब पर भारी है मगर पार्टी को लंबे समय से दीमक की तरह चाट रहे कुछ नेताओं को चंपई सोरेन रास नहीं आ रहे हैं. यही कारण है कि निकाय चुनाव में चंपई सोरेन से रायशुमारी नहीं की गई. एक बड़े मीडिया समूह में छपी रिपोर्ट से साफ हो गया है कि चंपई सोरेन बीजेपी में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं.
आदित्यपुर नगर निगम चुनाव के लिए जिन्हें प्रभारी बनाया गया है उनके नाम एक अनूठा कीर्तिमान है कि उन्हें जिनका भी प्रभारी बनाया गया है वह आज तक चुनाव नहीं जीता. यहां बात शैलेंद्र सिंह की कर रहे हैं. अर्जुन मुंडा के बेहद करीबी माने जाते हैं. लोग कहने से नहीं कतरा रहे कि अर्जुन मुंडा की दुर्दशा के लिए सबसे बड़ा कोई जिम्मेदार कारक यदि है तो वह शैलेंद्र सिंह है, उनका अपना कोई जनाधार नहीं है. पार्टी उन्हें किस तरह से आंकती है, यह पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जाने. अर्जुन मुंडा का करीबी होना या कुछ और. आदित्यपुर निकाय चुनाव प्रभारी उन्हें किस आधार पर बनाया गया इस पर भी सवाल उठ रहे हैं. जिन्होंने आज तक एक भी चुनाव नहीं जीता ना ही किसी को जिताया उसे इतने प्रतिष्ठित चुनाव का प्रभारी बनाए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं. यही कारण है कि चंपाई सोरेन ने खुलकर बगावत शुरू कर दिया है.
यही हाल कमोवेश आदित्यपुर नगर निगम के निवर्तमान मेयर विनोद कुमार श्रीवास्तव की हो चुकी है. निकाय चुनाव से ठीक पहले जिला और मंडल कमेटी की घोषणा बीजेपी ने की. इसमें चौंकाने वाला नाम आरआईटी मंडल अध्यक्ष का आया. पार्टी ने अभिषेक विशाल को आरआईटी मंडल अध्यक्ष बनाया. अभिषेक विशाल निवर्तमान मेयर के पुत्र हैं जिन्हें कोई नहीं जनता न अभिषेक विशाल किसी को जानते. पार्टी स्तर पर उनकी भूमिका बस यही है कि वे विनोद श्रीवास्तव के पुत्र और उनकी राजनीति विरासत का ध्वजवाहक हैं. पार्टी के जमीनी नेता और कार्यकर्ता जो लंबे समय से पार्टी का झंडा इस उम्मीद से ढो रहे थे कि आरआईटी मंडल अध्यक्ष और जिला कमेटी में विनोद श्रीवास्तव के प्रभाव से उन्हें लाभ मिलेगा मगर उनकी उम्मीदों को गहरा झटका लगा. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इसका आंकलन किस आधार पर किया यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है.
सरायकेला और खरसावां में पिछले 15 साल से बीजेपी सत्ता पर लौटने के लिए प्रयास कर रही है मगर मठाधीशों ने संगठन पर इस तरह से कब्जा जमा लिया है कि पार्टी का थिंक टैंक और शीर्ष नेतृत्व किंकर्तव्यविमूढ़ बन चुकी है. नेताओं के आपसी लड़ाई और संगठन में अपने लोगो को आगे करके अपनों को ही हराने के चक्कर में बीजेपी का कोल्हान में सूपड़ा साफ हो चुका है. वैसे इसका असर पूरे झारखंड में दिख रहा है.
आठ साल बाद हो रहे निकाय चुनाव में भी अंदरूनी कलह बीजेपी में खुलकर उभर गया है. कई नेता बगावत कर बिना पार्टी के समर्थन के चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं. इसका खामियाजा एकबार फिर बीजेपी को उठाना पड़ सकता है. आदित्यपुर नगर निगम की बात करें तो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पद पर बीजेपी एकमत होकर प्रत्याशी देने के मामले में विफल साबित हुई और सबसे अंत में समर्थित प्रत्याशी घोषित कर बागियों की फ़ौज खड़े कर लिए. विनोती हांसदा बगावत कर मेयर चुनाव लड़ रही हैँ. प्रभासिनी कालुंडिया को घोषित प्रत्याशी बताकर डरा- धमकाकर नाम बीजेपी आलाकमान ने वापस करा दिया और संजय सरदार को समर्थित प्रत्याशी घोषित कर दिया. उधर चंपाई सावित्री लियांगी के लिए यह कहते हुए कैम्पैनिंग में जुट गए कि कैंडीडेट के चयन में उनसे रायशुमारी नहीं की गई. प्रभासिनी दो बार वार्ड 35 से पार्षद थीं, निवर्तमान मेयर गुट से आती हैं. संजय सरदार अर्जुन मुंडा गुट से आते हैं. विनोती निवर्तमान डिप्टी मेयर बॉबी सिंह गुट से आती हैं.
बॉबी सिंह हाल के दिनों में अर्जुन मुंडा खेमे में सक्रिय हैं. डिप्टी मेयर रहते उन्होंने इतनी छवि नहीं बनाई कि अपने पारंपरिक वार्ड से खुद नहीं तो कम से कम अपनी पत्नी को चुनाव लड़ा सकें या कोई पार्षद यह कहे कि आकर उनके वार्ड से चुनाव लड़े वह अपनी सीट कुर्बान कर दे. वे वार्ड- 17 से पार्षद पद के लिए कसरत कर रहे हैं. पैसा और प्रभाव के बल पर हो सकता है कुछ सम्मान बचा लें मगर वार्ड 17 से चुनाव जीतना उनके लिए आसान नहीं होगा. उन्हें जनता को कई सवालों का जवाब देना होगा. मसलन डिप्टी मेयर रहते उन्होंने वार्ड 17 को क्या दिया. मेनिफेस्टो के झांसे में जनता नहीं आ सकती.
प्रभासिनी के आउट होने के बाद विनोद श्रीवास्तव बास्को बेसरा को समर्थन कर रहे हैं. बास्को बेसरा और विनोद श्रीवास्तव के रिश्ते किसी से छिपे नहीं है. ऐसे में संजय सरदार का जीतना आसान नहीं होगा.
कहा जा रहा है कि विनोद श्रीवास्तव अपनी पुत्रवधु या पत्नी को डिप्टी मेयर बनाने के लिए लॉबी सेट कर रहे हैं. पुत्रवधु वार्ड 28 से और पत्नी वार्ड 29 से चुनाव लड़ रही हैं. वार्ड 28 उनका अभेद किला है उस वार्ड से श्रीवास्तव परिवार को कोई हरा नहीं सकता. वार्ड 29 से पत्नी, वार्ड 30 से सतीश शर्मा, वार्ड 31 से रिंकू राय, वार्ड 34 से रीता देवी, वार्ड 35 से प्रभासिनी कालुंडिया, वार्ड 20 से प्रभावती देवी, वार्ड 17 से अमित रंजन उर्फ़ शानू, वार्ड 9 से बास्को बेसरा, सहित करीब दो दर्जन वार्ड में विनोद श्रीवास्तव ने अपने समर्थकों को उतारा है या उन्हें समर्थन दिला रहे हैं ताकि डिप्टी मेयर सीट पर कब्जा जमा सकें.
कुल मिलाकर विनोद श्रीवास्तव, अर्जुन मुंडा, चंपाई सोरेन के खेमेबंदी के बीच पार्टी समर्थित प्रत्याशी और नगर निगम के मेयर का सीट दोनों फंस सकता है इसकी प्रबल संभावना हो रही है. विनोद श्रीवास्तव ने जिस तरह से अपना जाल बिछाया है यदि फिट बैठ गया तो बास्को बेसरा मेयर और उनके परिवार का कोई सदस्य डिप्टी मेयर बनना लगभग तय है. पार्टी और पार्टी का समर्थक प्रत्याशी बस मोहरा बनकर रह जायेंगे. वैसे विनोद श्रीवास्तव मौकापरस्त राजनीति के जबरदस्त खिलाड़ी हैं. उनके व्यूह रचना ने कोल्हान के कई नेताओं का करियर समाप्त कर दिया और आज वे झंडा ढोने के काबिल भी नहीं रहे.
अपनी रसूख बचाने के चक्कर में बीजेपी के हर बड़े नेताओं ने कोल्हान में संगठन को बर्बादी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है. जरूरत है पार्टी को नए सिरे से गढ़ने और मठाधीश बनकर जमे नेताओं के पर कुतरने की. चंपाई सरीखे नेता को यदि तरजीह नहीं दिया गया तो आनेवाले दिनों में पार्टी को बड़ा खामियाजा उठाना पड़ सकता है क्योंकि ये वही चंपाई सोरेन है जिसके आगे मोदी लहर भी फीका रहा. उनका अपना लहर रहता है जरूरत उस लहर को संगठन हित में साधने की है. अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, बाबूलाल मरांडी और मधु कोड़ा के बीच सामंजस्य नहीं होने के कारण पार्टी बिखर रही है और विनोद श्रीवास्तव जैसे नेता चांदी काट रहे है. जमीन को असल में खोखला यही नेता कर रहे है गाज बागियों पर गिराने से क्या मिलने वाला है हमाम में तो सभी नंगे ही मिलेंगे आईना देखिये तो…..
नोट: यह विश्लेषण जमीनी स्तर से मिल रहे इनपुट के आधार पर तैयार किया गया है. अगली रिपोर्ट सरायकेला नगर पंचायत पर पढना न भूलें

