DESK REPORT झारखंड में सरकारी अधिकारियों की लगातार बढ़ती लापरवाही अब सरकार के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि हालातों को समय रहते नहीं संभाला गया तो आने वाले दिनों में यह लापरवाही मौजूदा सरकार पर भारी पड़ सकती है. आरोप है कि सरकार “मईया सम्मान योजना” के सहारे लंबे समय तक शासन नहीं चला सकती, क्योंकि इस योजना का पूरा वित्तीय भार राज्य के खजाने पर पड़ रहा है, जबकि सरकार के पास इसे पूर्ति करने के लिए कोई स्पष्ट नीति या ठोस योजना नहीं है.

राज्य के कई विभागों में हालात चिंताजनक बताए जा रहे हैं. बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मियों को सात- आठ महीने से वेतन नहीं मिला है. विभिन्न सरकारी कार्यालयों, प्रखंड मुख्यालयों और जिला स्तर के दफ्तरों में सन्नाटा पसरा हुआ है. अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कार्यालय पहुंचने वाले लोगों को महीनों चक्कर लगाने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं मिल रही. कई अधिकारी केवल उन्हीं कार्यों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक लाभ मिलने की संभावना होती है.
कई विभागों के महत्वपूर्ण पद लंबे समय से प्रभार में चल रहे हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और अधिक कमजोर हो रही है. वहीं “आपकी योजना- आपकी सरकार- आपके द्वार” शिविरों को लेकर भी लोगों में आक्रोश है. शिविरों में ग्रामीणों को भेड़ की तरह लाइन में खड़ा कर कंबल, धोती- साड़ी का वितरण कर औपचारिक कार्यवाही के नाम पर फोटोशूट किया जा रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर अधिकांश दावे अधूरे हैं. शिविर के नाम पर अधिकारी दफ्तरों से गायब रह रहे हैं. दफ़्तरों में पहुंचने वाले लोग मायूस होकर लौट रहे हैं.
भ्रष्टाचार को लेकर भी हालात गंभीर बताए जा रहे हैं. कई विभागों में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और अधिकारियों में शासन का कोई खौफ नहीं दिखाई देता. लोगों का कहना है कि रघुवर दास के शासनकाल में अधिकारियों पर नियंत्रण अधिक था और प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर ढंग से काम करती थी, जबकि वर्तमान में किसी भी अधिकारी पर अनुशासन या जवाबदेही का दबाव महसूस नहीं होता. आप कुछ भी लिख लीजिए कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है क्योंकि ऊपर सब मैनेज है.
अखबारों और मेन स्ट्रीम मीडिया में भी सरकारी विज्ञापनों के दबाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं. भ्रष्टाचार या अनियमितताओं से संबंधित कई खबरें मुख्यधारा मीडिया में कम दिखाई पड़ती हैं, जबकि सोशल मीडिया पर लोग खुलकर अपनी बात रख रहे हैं. आरोप यह भी है कि सरकार प्रशासनिक सुधार पर ध्यान देने के बजाय “मईया सम्मान योजना” को राजनीतिक आधार बना रही है और इसी पर निर्भर होकर सत्ता की नैया चलाने की कोशिश कर रही है.
वित्तीय स्तर पर भी राज्य की स्थिति कमजोर होती दिख रही है. निकाय चुनाव न होने के कारण केंद्र से मिलने वाले फंड अटके हुए हैं. जीएसटी की राशि को लेकर केंद्र- राज्य विवाद जारी है. खनिज संपदा की रॉयल्टी पर भी तनातनी बनी हुई है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकारी मशीनरी इसी तरह बेलगाम रही और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगी, तो आने वाले समय में शासन की पूरी व्यवस्था चरमरा सकती है और इसका सीधा खामियाजा मौजूदा सरकार को भुगतना पड़ सकता है. मौजूदा सरकार की सहयोगी दल भी सत्ता सुख के कारण मौन बनी बैठी है. जमानत पर चल रहे मुख्यमंत्री कहीं एकबार फिर से सरकारी अफसरशाही से मुसीबत में न पड़ जाएं समय रहते चेतना होगा. आज राज्य में विपक्ष भले कमजोर है मगर सरकार को यह याद रखना होगा जिस दिन केंद्र सरकार को लगेगा राज्य की सत्ता हथियानी है उस दिन राज्य में खेला हो जाएगा. बिहार का सुनामी अभी ज्यादा दिन नहीं बिता है. उस वक्त आपके अधिकारी ही आपके साथ खड़ा नहीं होंगे क्योंकि वे आपके वश में हैं नहीं. हमारी यह रिपोर्ट सरकार को सचेत करने के लिए है जो जमीनी हालात से जुटाये गए हैं. सरकार इसे किस तरह लेती है यह सरकार की जिम्मेदारी है.

