सरायकेला: गम्हरिया स्थित जेएफसीआई अनाज गोदाम में हाल ही में हुई अग्निकांड की घटना अब नए मोड़ पर पहुंच गई है. घटना की जांच चल रही है, वहीं मीडिया ट्रायल के चलते साजिश और षड्यंत्र की आशंका गहराने लगी है. प्रशासनिक जांच टीम ने प्रारंभिक रिपोर्ट में एजीएम अभिषेक हाजरा और डीएसडी ठेकेदार राजू सेनापति को आगजनी के लिए जिम्मेदार ठहराया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच टीम ने गोदाम प्रबंधक अभिषेक हाजरा, डोर-स्टेप डिलीवरी ठेकेदार राजू सेनापति और संविदा कर्मी अशोक शर्मा की भूमिका को संदिग्ध बताया है. जबकि अभिषेक हाजरा और राजू सेनापति फिलहाल टाटा मुख्य अस्पताल के बर्न यूनिट में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं. डॉक्टरों के अनुसार, दोनों की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है.
जांच टीम ने दावा किया है कि संविदा कर्मी अशोक शर्मा घटना के बाद से लापता है, इसलिए तीनों को संदिग्ध माना गया. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अस्पताल में भर्ती अभिषेक हाजरा का इलाज कैसे चल रहा है और जांच किन बिंदुओं पर आधारित है. केवल एक कर्मी के फोन नहीं उठाने के आधार पर सभी को दोषी ठहराना कितना उचित है, यह बड़ा सवाल बन गया है.
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, अशोक शर्मा न तो फरार है और न ही भूमिगत. वह लगातार अस्पताल में रहकर दोनों घायलों के इलाज के लिए आर्थिक सहयोग जुटा रहा है. पुलिस द्वारा बुलाए जाने पर उसने बयान भी दिया है. ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर दोषी ठहराना न्यायोचित है कि उसे चोट नहीं आई.
मामले की तह में जाने पर यह भी सामने आया है कि जांच टीम ने न तो एजीएम और न ही ट्रांसपोर्टर से बयान लिया है. घटना किन परिस्थितियों में घटी या आग कैसे लगी, इसका खुलासा अब तक नहीं हो पाया है. क्या गोदाम से अनाज की गड़बड़ी या विभागीय लापरवाही की भी जांच होगी, यह अभी अस्पष्ट है. क्या इस पूरे प्रकरण में एमओ, बीसीओ और डीएसओ की भूमिका की भी जांच होगी ?
मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि घटनास्थल के पास एक “कटा हुआ अंगूठा” मिला, जो कथित तौर पर राजू सेनापति का बताया गया. लेकिन अस्पताल सूत्रों ने बताया कि यह अंगूठा नहीं बल्कि एजीएम अभिषेक हाजरा के झुलसे अंगूठे की त्वचा थी, जो आग की गंभीरता के कारण अलग हो गई थी.
डॉक्टरों का कहना है कि एजीएम और डीएसडी ठेकेदार दोनों की स्थिति अत्यंत नाजुक है और उन्हें मानसिक रूप से मजबूत रहना होगा. इस बीच, नकारात्मक मीडिया रिपोर्टिंग से उनका मनोबल प्रभावित हो सकता है, जिससे इलाज पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है.
यदि दोनों की स्थिति और बिगड़ती है, तो संभव है कि गोदाम में लगी आग का “सच” हमेशा के लिए दफन हो जाए. अंततः संविदा कर्मी अशोक शर्मा को बलि का बकरा बनाकर पूरा मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा.
ऐसे में आवश्यक है कि मीडिया संस्थान बिना पुष्टि किए किसी भी भ्रामक जानकारी का प्रसार न करें. इस संवेदनशील समय में प्राथमिकता इलाजरत कर्मियों के स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षा होनी चाहिए, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम के असली चश्मदीद वही दोनों हैं.

