नई दिल्ली. चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे ने देश की संवैधानिक संस्थाओं के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर नई बहस छेड़ दी है. आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) यानी मतदाता सूची की विशेष समीक्षा कब और कैसे करनी है, यह पूरी तरह उसका विशेषाधिकार है. आयोग के अनुसार किसी अन्य संस्था, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट को भी इस प्रक्रिया में दखल देने का अधिकार नहीं है. आयोग ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 के नियम 25 का हवाला दिया है.

इस हलफनामे के सामने आने के बाद संवैधानिक विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि चुनाव आयोग की इस दलील से लोकतांत्रिक ढांचा और न्यायपालिका की भूमिका कमजोर हो सकती है. आलोचकों का कहना है कि अगर आयोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को भी न माने, तो मतदाता सूची की शुचिता और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.
हालांकि चुनाव आयोग का पक्ष है कि उसने केवल अपने संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या की है. आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची की समीक्षा, समय निर्धारण और प्रक्रियाएँ उसके विवेक का विषय हैं. आयोग का कहना है कि वह समय-समय पर मतदाता सूची को अपडेट करता है और इस प्रक्रिया को पारदर्शी एवं तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है.
वहीं कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान के रक्षक के रूप में इस मामले में निगरानी भूमिका निभाने का अधिकार है. उनके अनुसार न्यायपालिका का काम यह सुनिश्चित करना है कि संवैधानिक संस्थाएं अपने अधिकारों का इस्तेमाल जनहित और कानून के दायरे में करें.
नागरिक संगठनों और चुनाव सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे संस्थानों ने यह भी कहा है कि मतदाता सूची में गलतियाँ और विसंगतियाँ आम बात हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष बनी रह सकती है. उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि SIR की समय सीमा आयोग की मर्जी पर होगी तो यह कमजोर वर्गों, प्रवासी मजदूरों और युवाओं के मताधिकार को प्रभावित कर सकता है.
राजनीतिक दलों ने भी अलग-अलग प्रतिक्रिया दी है. कुछ दलों ने कहा है कि आयोग की स्वायत्तता जरूरी है ताकि वह राजनीतिक दबाव से मुक्त रह सके. वहीं कुछ दलों ने आयोग की इस दलील को ‘अत्यधिक अधिकार का दावा’ बताया है. उनका कहना है कि जब देश में कोई भी संस्था सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से ऊपर नहीं हो सकती तो आयोग को भी न्यायपालिका के निर्देश मानने चाहिए.
यह विवाद उस समय सामने आया है जब देश में कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल रही हैं. चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि वह मतदाता सूची की पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, आपत्तियों और दावों के निवारण की प्रक्रिया को और मजबूत कर रहा है.
विवाद चाहे जैसा भी हो, इस पूरे घटनाक्रम ने संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार और जिम्मेदारियों पर नया विमर्श छेड़ दिया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग दोनों को संविधान की मर्यादाओं के भीतर रहते हुए संतुलित समाधान खोजना होगा ताकि मतदाता सूची की निष्पक्षता बनी रहे और लोकतंत्र में जनता का भरोसा कायम रहे.

