चांडिल/ Vikash Thakur झारखंड आंदोलन के इतिहास में 21 अक्टूबर 1982 का दिन एक अमिट और दर्दभरा अध्याय बन गया था. इसी दिन तिरुलडीह गोलीकांड में छात्र नेता शहीद अजीत महतो और धनंजय महतो ने झारखंड राज्य की पहचान और अधिकार के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी. उस समय हजारों छात्र और आंदोलनकारी “प्रखंड को अकाल क्षेत्र घोषित करो” की मांग को लेकर शांतिपूर्ण धरना पर बैठे थे, लेकिन पुलिस की गोलीबारी ने इस आंदोलन को रक्तरंजित कर दिया था.

शहीद दिवस के मौके पर समाजसेवी खगेन महतो सहित बड़ी संख्या में लोग तिरुलडीह के शहीद स्थल पर पहुंचे और श्रद्धासुमन अर्पित किए. श्रद्धांजलि सभा में खगेन महतो ने कहा कि जिन शहीदों की कुर्बानी से झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला, उन्हें आज भी वह सम्मान नहीं मिल पाया है जिसके वे हकदार हैं. उन्होंने कहा कि उस दौर के छात्र और नौजवान साइकिल या पैदल चलकर आंदोलन में शामिल होते थे, जो उनके समर्पण और संघर्ष का प्रतीक था.
सभा में उपस्थित लोगों ने यह संकल्प लिया कि झारखंड आंदोलन की भावना और शहीदों के आदर्शों को जीवित रखते हुए सामाजिक न्याय, स्वाभिमान और विकास की राह पर संघर्ष जारी रहेगा. शहीदों के सम्मान में कार्यक्रम स्थल पर ‘अमर रहे झारखंड के वीर सपूत’ के नारे गूंज उठे.

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