Editorial कोल्हान की सियासत इस वक्त बीजेपी के भीतर सुलगती आग की गवाह बन चुकी है. बाहर से संगठन एकजुट दिखाने की कोशिश हो रही है, लेकिन अंदर गुटबाजी की दरारें अब सतह पर साफ दिखने लगी हैं. प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू का बुधवार को कोल्हान दौरा चुनावी रणनीति से ज्यादा शक्ति संतुलन की परीक्षा बन गया. सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश अध्यक्ष के दौरे के दौरान सिटिंग विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन की दूरी महज संयोग रही या राजनीतिक संदेश ? यदि यह असहमति है, तो यह साधारण मतभेद नहीं बल्कि संगठनात्मक संकट का संकेत है.

*आदिवासी नेतृत्व को साइडलाइन करने का जोखिम*
कोल्हान आदिवासी बहुल क्षेत्र है. यहां चंपाई सोरेन केवल एक नेता नहीं बल्कि राजनीतिक पहचान हैं. यदि निकाय चुनाव में प्रत्याशी चयन में उनकी राय की अनदेखी हुई है, तो यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं बल्कि आदिवासी नेतृत्व के सम्मान का प्रश्न बन सकता है. भाजपा के पास फिलहाल चंपाई जैसा प्रभावशाली आदिवासी चेहरा दूसरा नहीं है. ऐसे में उन्हें हाशिए पर डालने की रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है.
*गुटबाजी की सियासत और अर्जुन मुंडा फैक्टर*
पार्टी के भीतर चल रही खेमेबाजी अब खुलकर सामने आ चुकी है. जिला स्तर से भेजे गए प्रस्तावों को दरकिनार कर अंतिम समय में नए चेहरे को आगे करना यह दर्शाता है कि निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही. शैलेंद्र सिंह और विनोद श्रीवास्तव पर अर्जुन मुंडा लॉबी को मजबूत करने के आरोप राजनीतिक हवा को और गरम कर रहे हैं. यदि पार्टी के भीतर ही शक्ति संतुलन की लड़ाई छिड़ी है, तो इसका सीधा असर बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ता मनोबल पर पड़ेगा. निकाय चुनाव में हार केवल सीटों की हार नहीं होगी, बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाएगी.
*साहू की सियासी अग्निपरीक्षा*
घाटशिला में झटका झेल चुके आदित्य साहू के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई है. 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा शहरी निकायों से तय हो सकती है. लेकिन यदि प्रदेश अध्यक्ष मीडिया के सवालों से बचते नजर आएं और आंतरिक मतभेदों पर खुलकर संवाद न करें, तो संदेश यह जाता है कि संकट गहरा है. नेतृत्व का असली परीक्षण चुनावी मंच पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक असंतोष को संभालने में होता है.
*बगावत की आहट*
आदित्यपुर और सरायकेला में बागी तेवर किसी से छिपे नहीं हैं. यदि हर बूथ पर असंतोष पनप रहा है, तो यह चेतावनी है कि पार्टी अंदर से कमजोर हो रही है. ऐसे में विपक्ष को मेहनत करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. यदि बास्को बेसरा की जीत होती है, तो इसे प्रदेश नेतृत्व की रणनीतिक जीत नहीं बल्कि अंदरूनी लॉबी की सफलता माना जाएगा. बास्को बेसरा विनोद श्रीवास्तव के करीबी हैं यह किसी से छिपा नहीं है. अर्जुन मुंडा से भी उनके नजदीकी रिश्ते हैं. ऐसे में यदि पार्टी समर्थित प्रत्याशी संजय सरदार की हार होती है, तो ठीकरा किसके सिर फूटेगा यह बड़ा सवाल होगा. वैसे संजय सरदार भी अर्जुन मुंडा खेमे के हैं मगर धनबल और बाहुबल के मामले में बास्को बेसरा उनसे कोसों आगे हैं.
*मूल प्रश्न*
क्या भाजपा कोल्हान में संगठन बचाने की लड़ाई लड़ रही है या भीतर ही भीतर नेतृत्व की कुर्सी मजबूत करने की जंग? निकाय चुनाव का परिणाम चाहे जो हो, इतना तय है कि यह चुनाव केवल नगर निकायों का नहीं बल्कि भाजपा के अंदर शक्ति संतुलन का जनमत संग्रह बन चुका है. यदि समय रहते संवाद और समन्वय की पहल नहीं हुई, तो कोल्हान की जमीन पर पार्टी की पकड़ और ढीली हो सकती है. राजनीति में संदेश अक्सर शब्दों से ज्यादा संकेत देते हैं. कोल्हान में जो संकेत मिल रहे हैं, वे भाजपा के लिए चेतावनी की घंटी हैं. कोल्हान से करीब- करीब गायब हो चुकी बीजेपी के कमल को खतरा किसी और से नहीं बल्कि अपने ही जहरीले कीचड़ से है. समय रहते यदि कीचड़ों की सफाई नहीं हुई तो आने वाले समय में पार्टी को इसका बड़ा खामियाजा उठाना पड़ सकता है.

