आदित्यपुर: साउथ ईस्टर्न रेलवे द्वारा 19 फरवरी 2002 को अधिसूचना जारी कर आदित्यपुर रेलवे यार्ड को प्रोन्नत करते हुए आदित्यपुर रेलवे स्टेशन का दर्जा दिया गया था. आज इस ऐतिहासिक निर्णय के 25 वर्ष पूरे हो गए हैं. हालांकि उस समय स्टेशन को ई श्रेणी का दर्जा दिया गया, जिसके कारण यात्रियों को सीमित सुविधाएं ही मिल पाईं. सामाजिक संगठन जन कल्याण मोर्चा के अनुसार, स्टेशन पर बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर संगठन को आंदोलन करना पड़ा. प्लेटफॉर्म की लंबाई बढ़ाने और यात्री सुविधाओं के विस्तार की मांग को लेकर मोर्चा ने वर्ष 2013 में झारखंड हाई कोर्ट में जनहित याचिका संख्या WP(PIL) No.154/2013 दायर की. अदालत ने 21 अगस्त 2015 के अपने आदेश में रेलवे को नियमों के अनुसार यात्री सुविधाओं में वृद्धि पर विचार करने का निर्देश दिया.

मोर्चा का कहना है कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद स्टेशन पर सुविधाओं में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अब भी कई आवश्यक सुविधाएं अधूरी हैं. संगठन का स्पष्ट मत है कि जब तक टाटा- पटना, टाटा- छपरा, टाटा- पटना सुपर सहित अन्य प्रमुख एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव आदित्यपुर रेलवे स्टेशन पर सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक स्थानीय जनता की नाराजगी दूर नहीं होगी.
जन कल्याण मोर्चा ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग कभी यह नहीं रही कि ट्रेन की शुरुआत आदित्यपुर से हो, बल्कि मांग केवल इतनी है कि जो भी ट्रेनें चलें, उनका ठहराव आदित्यपुर स्टेशन पर सुनिश्चित किया जाए. संगठन का आरोप है कि इस मामले में रेलवे प्रशासन उदासीन रवैया अपना रहा है.
मोर्चा के अनुसार, उनकी पहल पर तत्कालीन रेल मंत्री नितीश कुमार के निर्देश से 1 जून 2003 से टाटा- छपरा ट्रेन का ठहराव प्रारंभ हुआ था. इसके बाद तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर 1 जनवरी 2006 से टाटा- पटना ट्रेन का ठहराव भी शुरू किया गया था.
संगठन का कहना है कि कोरोना काल का हवाला देकर आदित्यपुर सहित कई स्टेशनों पर एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव बंद कर दिया गया, जिससे यहां के यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. विशेषकर वे यात्री, जिनका संबंध बिहार और उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी क्षेत्रों से है, उन्हें आवागमन में कठिनाई हो रही है. जन कल्याण मोर्चा के अधिवक्ता ओम प्रकाश ने कहा कि संगठन आगे भी यात्रियों के अधिकार और सुविधाओं के लिए संघर्ष जारी रखेगा.

