आदित्यपुर: नगर निगम क्षेत्र में निकाय चुनाव की आहट के साथ ही तथाकथित जनसेवा का राजनीतिक संस्करण सामने आने लगा है. ठंड के मौसम में गरीबों के नाम पर सरकारी कंबल वितरण अब खुले तौर पर राजनीति का हथियार बनता दिख रहा है. नेताओं द्वारा अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और फोटो खिंचवाने की होड़ ने प्रशासनिक व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है.

रविवार को आदित्यपुर-2 के रोड नंबर सात में कंबल वितरण के दौरान हालात उस समय बेकाबू हो गए, जब कंबल लेने पहुंचे लोगों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई. हैरानी की बात यह रही कि यह पूरा हंगामा सांसद की मौजूदगी में हुआ. स्थिति बिगड़ती देख पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा और भीड़ को नियंत्रित करना पड़ा.
जानकारी के अनुसार कंबल वितरण नगर निगम की ओर से किया जाना था, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप ने पूरी व्यवस्था को अस्त- व्यस्त कर दिया. आनन- फानन में नगर निगम ने आधे- अधूरे तरीके से कुछ कंबल बांटे और शेष कंबल समेट कर वापस लौट गई. नतीजा यह हुआ कि लाभुकों में नाराजगी और अव्यवस्था दोनों देखने को मिली.
असल सवाल हंगामे का नहीं, बल्कि व्यवस्था और नीयत का है. हर वर्ष सरकारी स्तर पर गरीबों को कंबल बांटे जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन कंबलों की उम्र एक साल भी नहीं होती. क्या वही चेहरे हर साल लाइन में खड़े होकर दोबारा कंबल लेने को मजबूर हैं. डेढ़ सौ से दो सौ रुपये के कंबल पर इस तरह की राजनीति यह दर्शाती है कि जनकल्याण से ज्यादा प्राथमिकता प्रचार और प्रदर्शन को दी जा रही है.
स्थिति यह है कि लोग सौ- डेढ़ सौ रुपये के कंबल के लिए घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं और नेताओं के जुमलों में उलझकर इसे सौभाग्य मान रहे हैं. जबकि बेहतर और सम्मानजनक तरीका यह हो सकता था कि नगर निगम या जनप्रतिनिधि कंबलों को पैक कर वास्तविक जरूरतमंदों के घर तक पहुंचाते. इससे न केवल लाभुकों का सम्मान बना रहता, बल्कि अव्यवस्था और टकराव की नौबत भी नहीं आती.
लेकिन विभाग और नेताओं की प्राथमिकता लाभुक नहीं, बल्कि तस्वीर और प्रचार है. यही वजह है कि कंबल वितरण अब सेवा नहीं, बल्कि चुनावी प्रवेश द्वार बनता जा रहा है. चर्चा है कि कई ऐसे चेहरे, जिन्होंने आज तक नगर निगम के विकास के लिए कोई ठोस काम नहीं किया, अब निगम की नागरिकता लेकर निकाय चुनाव में उतरने की तैयारी में हैं. कंबल वितरण के जरिये निगम की राजनीति में एंट्री की जमीन तैयार की जा रही है.
सूत्रों की मानें तो निवर्तमान पार्षदों के माध्यम से वार्ड स्तर पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति भी बनाई जा रही है. कुल मिलाकर कंबल अब ठंड से बचाने का साधन नहीं, बल्कि सियासत की गर्माहट बढ़ाने का जरिया बन गया है. अब फैसला जनता के हाथ में है- उसे हर साल मिलने वाला कंबल चाहिए या स्थायी विकास, सम्मान और मजबूत नगर व्यवस्था.

