आदित्यपुर: नगर निगम चुनाव का मौसम है. घोषणा पत्रों की बहार है. वादों की फुहार है. और जनता के सामने फिर वही सुनहरा ख्वाब परोसा जा रहा है- “हम जीत गए तो आदित्यपुर को पेरिस बना देंगे, स्विटजरलैंड जैसा चमका देंगे.”


सवाल बस इतना है कि दस- पंद्रह हजार मानदेय के आसरे मेयर और सात हजार रुपये मानदेय के आसरे पार्षद आखिर किस जादुई चिराग से यह सपना पूरा करेंगे ? जबकि राज्य का खजाना पहले से दबाव में है. केंद्र और राज्य सरकार के बीच तालमेल की चर्चा भी अक्सर सुर्खियों में रहती है. ऐसे में करोड़ों की परियोजनाएं किस फंड से धरातल पर उतरेंगी, यह घोषणा पत्र में साफ नहीं लिखा होता.
आदित्यपुर शहरी जलापूर्ति योजना पिछले सात वर्षों से फाइलों और पाइपों के बीच उलझी है. सीवरेज योजना धूल फांक रही है. कुछ योजनाएं अदालत की फटकार के बाद ही किसी तरह आगे बढ़ती दिखती हैं. मगर चुनाव आते ही वही योजनाएं अचानक “प्राथमिकता” बन जाती हैं.
व्यंग्य यह है कि चुनाव जीतने के बाद यही जनप्रतिनिधि कुछ महीनों में सुर बदलते नजर आते हैं. पहले “विकास का संकल्प” और बाद में “विभाग सहयोग नहीं कर रहा.” फिर धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन और बयानबाजी का दौर. जनता से कहा जाएगा- “हम तो काम करना चाहते हैं, मगर सरकार साथ नहीं दे रही.”
घोषणा पत्रों में स्मार्ट रोड, 24 घंटे पानी, अंडरग्राउंड ड्रेनेज, वाई- फाई जोन, मोहल्ला क्लिनिक, नदी में स्लूईस गेट, पार्कों का निर्माण- सौंदर्यीकरण, महिलाओं की सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरे इनस्टॉलेशन, युवाओं के लिए रोजगार, अत्याधुनिक लाइब्रेरी, बुजुर्ग क्लब- सब कुछ एक ही झटके में. मानो नगर निगम नहीं, कोई वैश्विक विकास प्राधिकरण बनने जा रहा गहो.
दरअसल हर चुनाव में सपनों का आकार बढ़ता जाता है और बजट की हकीकत सिकुड़ती जाती है. अब जनता के सामने असली सवाल यह है- क्या वे फिर “घोषणापत्र संस्करण 2026” पर भरोसा करेंगी ? या इस बार उम्मीदवारों से पूछेंगी कि पेरिस और स्विटजरलैंड का नक्शा दिखाने से पहले आदित्यपुर की टूटी सड़कों, जलजमाव और अधूरी योजनाओं का हिसाब दें. चुनाव लोकतंत्र का पर्व है. मगर पर्व और परिकथा में फर्क होता है. परिकथा में जादू होता है. लोकतंत्र में जवाबदेही. देखना दिलचस्प होगा कि इस बार जनता सपनों को वोट देती है या सवालों को.

