Indianewsviral Editorial सरायकेला: आदित्यपुर नगर निगम चुनाव इस बार सामान्य चुनाव नहीं बल्कि राजनीतिक समीकरणों की प्रयोगशाला बनता दिख रहा है. परिसीमन, ट्रिपल टेस्ट और मतदाता सूची की विसंगतियों ने चुनावी माहौल को पहले ही विवादों में ला दिया है. झारखंड हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका ने यह संकेत जरूर दिया है कि असंतोष व्यापक है, लेकिन व्यावहारिक स्थिति यह है कि चुनाव मौजूदा रोस्टर के आधार पर ही होने की संभावना अधिक है.

मेयर पद का एसटी आरक्षण इस चुनाव का सबसे निर्णायक फैक्टर है. निगम क्षेत्र में एसटी आबादी लगभग 15 से 17 प्रतिशत के बीच है. यानी 80 प्रतिशत से अधिक मतदाता गैर-एसटी हैं, लेकिन उन्हें एसटी प्रत्याशी में से ही मेयर चुनना होगा. यही वह बिंदु है जहां से असंतोष और रणनीति दोनों शुरू होते हैं.
इंडिया न्यूज़ वायरल बिहार झारखंड के ग्राउंड सर्वे के अनुसार, चुनाव तीन स्तर पर लड़ा जाएगा. पहला, आदिवासी बहुल बस्तियों में जातीय ध्रुवीकरण. दूसरा, शहरी कॉलोनियों में विकास बनाम असंतोष. तीसरा, राजनीतिक दलों की आंतरिक खींचतान.
झामुमो ने सबसे पहले उम्मीदवार घोषित कर बढ़त लेने की कोशिश की है. भुगलू सोरेन उर्फ डब्बा सोरेन संगठनात्मक रूप से सक्रिय हैं, लेकिन शहरी वोट बैंक में उनकी व्यक्तिगत स्वीकार्यता सीमित मानी जा रही है. मुस्लिम बहुल वार्डों में उन्हें सहानुभूति आधारित समर्थन मिल सकता है, परंतु आदिवासी क्षेत्रों में एकतरफा ध्रुवीकरण संभव नहीं दिख रहा. वहां वोटों का बिखराव तय है. शिक्षा के मामले में डिप्लोमा धारी हैं.
बीजेपी की स्थिति और जटिल है. पार्टी के पास मजबूत एसटी चेहरा फिलहाल स्पष्ट नहीं है. प्रभासिनी कालुंडिया का नगर राजनीति में अनुभव है, लेकिन वे संगठन की आधिकारिक पसंद होंगी या नहीं यह स्पष्ट नहीं. वे वार्ड 35 से तीन बार चुनाव जीत चुकी हैं. निवर्तमान मेयर विनोद कुमार श्रीवास्तव का उन्हें खास माना जाता है. बोरजो राम हांसदा और उनकी पत्नी विनोती हांसदा भी तीन टर्म से वार्ड- 24 के पार्षद रहे हैं. दोनों ने पार्टी फोरम पर दावेदारी पेश किया है. दोनों निवर्तमान डिप्टी मेयर बॉबी सिंह के खेमे के माने जाते हैं. इस फेहरिस्त में संजय सरदार का भी नाम सामने आ रहा है. संगठननिष्ठ चेहरा हैं, पर व्यापक शहरी पहचान सीमित है. पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा के करीबी माने जाते हैं. सर्वे यह संकेत देता है कि यदि बीजेपी एकजुट चेहरा नहीं उतार पाती तो वोट ट्रांसफर में कठिनाई होगी.
कांग्रेस और राजद की स्थिति दिलचस्प है. झामुमो ने अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर बिहार विस चुनाव के अपमान का बदला लेने के संकेत साफ तौर पर दे दिया है. अब महागठबंधन धर्म का मसला ही नहीं रह गया. राजद ने भी अपने प्रत्याशी के रुप में सकला मार्डी या उनकी पत्नी को उतारने का मन बनाया है. यदि विपक्षी मत एकजुट होते तो कांग्रेस के कालीपद सोरेन जैसे शिक्षित और स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार समीकरण बदल सकते हैं. पेशे से प्रोफेसर रहे कालीपद सोरेन के पास विधायकी लड़ने का अनुभव रहा हैं. पत्नी ओलिव ग्रेस कुल्लू जेलर रह चुकी थी, सेवानिवृति के बाद राजनगर से प्रमुख बनी मगर असामयिक निधन हो गया. एक पुत्र एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद रिम्स में डॉक्टर हैं. गम्हरिया में गैस एजेंसी है. सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते हैं. लेकिन जमीन पर संगठनात्मक कमजोरी बड़ी बाधा है. कांग्रेस छोड़ किसी भी दल के पास कालीपद सोरेन जैसा शिक्षित और बेदाग राजनीतिज्ञ नहीं हैं.
बास्को बेसरा का नाम चर्चा में जरूर है, पर उनकी राजनीतिक स्थिरता पर मतदाताओं का भरोसा कम दिख रहा है. अवसरवाद की छवि शहरी मतदाताओं में उन्हें सीमित कर सकती है. धनबल और बाहुबल के दम पर वे चुनाव जीत लें ऐसी संभावना कम है. शिक्षा के मामले में हमें स्रोत ज्ञात नहीं हो सका है.
झामुमो से लालबाबू सरदार, कांग्रेस से खिरोद सरदार, कांग्रेस से ही रमेश बालमुचू भी ताल ठोंक रहे हैं. जो किसी भी प्रत्याशी के चुनावी गणित को अपने क्षेत्र के आदिवासी मतदाताओं को प्रभावित कर बिगाड़ सकते हैं. वैसे शहरी मतदाताओं पर इनका कोई असर नहीं पड़नेवाला है.
पुरेन्द्र नारायण सिंह की अनुपस्थिति चुनावी गणित में बड़ा शून्य है. यदि वे मैदान में होते तो समीकरण अलग हो सकते थे. परिसीमन ने कई पुराने नेताओं की राजनीतिक जमीन खिसका दी है.
सबसे महत्वपूर्ण संकेत वार्ड स्तर से मिल रहे हैं. इंडिया न्यूज़ वायरल के सर्वे में पाया गया कि 10 से 12 पार्षद ही मजबूत वापसी की स्थिति में हैं. शहरी मतदाता विकास, सफाई, जलनिकासी और सड़क जैसे मुद्दों पर नाराज दिख रहे हैं. पिछले 15 वर्षों की सत्ता के खिलाफ अंदरूनी असंतोष साफ दिख रहा है.
समग्र विश्लेषण यह बताता है कि यह चुनाव परंपरागत पार्टी लहर पर नहीं बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत विश्वसनीयता और बूथ प्रबंधन पर तय होगा. आदिवासी वोटों का बिखराव और शहरी वोटों का असंतोष मिलकर परिणाम को अप्रत्याशित बना सकते हैं. इस बार आदित्यपुर में सीधी नहीं बल्कि त्रिकोणीय या बहुकोणीय लड़ाई की पूरी संभावना है. अंतिम क्षणों में उम्मीदवार चयन ही जीत और हार की असली चाबी साबित होगा.
Note: यह विश्लेषण India News Viral Bihar Jharkhand के रिपोर्टरों द्वारा तैयार किया गया जमीनी सर्वे है. इसमें किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल के प्रभाव का समावेश नहीं है. जनता के मिजाज को टटोलकर यह रिपोर्ट तैयार की गई है. अंत में जनता ही मालिक होगी. जनता का आदेश ही जनादेश होगा.

