आदित्यपुर: नगर निगम द्वारा आयडा (AIADA) की जमीन पर डंप किए जा रहे शहरी कचरे में बार- बार आग लगने की घटनाओं ने अब गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट का रूप ले लिया है. बुधवार को एक बार फिर कचरे में लगी आग से उठते जहरीले धुएं ने आसपास के रिहायशी इलाकों और औद्योगिक इकाइयों में काम कर रहे मजदूरों की सांसें थाम दीं.


पिछले एक महीने से लगातार हो रही इन घटनाओं ने नगर निगम की कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि धुएं की वजह से आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ और सिरदर्द जैसी समस्याएं आम हो गई हैं.
तकनीकी पहलू: क्यों लगती है कचरे में बार-बार आग ?
विशेषज्ञों के अनुसार खुले में डंप किए गए ठोस कचरे में जैविक (organic) पदार्थ सड़ने लगते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान मीथेन (Methane) जैसी ज्वलनशील गैसें बनती हैं. जब तापमान बढ़ता है या कचरे में रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, तो स्वतः आग लगने की संभावना बढ़ जाती है. इसके अलावा प्लास्टिक, रबर, मेडिकल वेस्ट और औद्योगिक कचरे का मिश्रण आग को और अधिक खतरनाक बना देता है. इससे निकलने वाला धुआं सामान्य धुआं नहीं, बल्कि अत्यधिक विषैला होता है.
स्वास्थ्य पर असर: “साइलेंट किलर” बन रहा धुआं
कचरे में लगने वाली आग से निकलने वाले धुएं में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), डाइऑक्सिन (Dioxins), फ्यूरान (Furans) और सूक्ष्म कण (PM2.5) होते हैं. ये तत्व मानव शरीर के लिए बेहद खतरनाक हैं. लगातार संपर्क से अस्थमा और ब्रोंकाइटिस का खतरा बढ़ता है. लंबे समय तक प्रभाव रहने पर फेफड़ों की क्षमता कम हो सकती है. कार्बन डाइऑक्सिन जैसे तत्व कैंसर तक का कारण बन सकते हैं. मजदूर वर्ग, बुजुर्ग और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहां पहले से ही वायु प्रदूषण का दबाव है, ऐसे में यह अतिरिक्त धुआं स्थिति को और गंभीर बना रहा है.
प्रशासनिक चूक या सिस्टम की विफलता ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आदित्यपुर नगर निगम बने 8 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाल पाया. अब तक वैज्ञानिक लैंडफिल साइट विकसित नहीं हो सकी. कचरे का पृथक्करण (Segregation) जमीनी स्तर पर लागू नहीं है. वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट की कमी साफ नजर आती है. वहीं झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, AIADA और नगर निगम की चुप्पी इस पूरे मामले को और गंभीर बना रही है.
कानूनी और नीतिगत पहलू
भारत में ठोस कचरा प्रबंधन के लिए 2016 के नियम (Solid Waste Management Rules 2016) लागू हैं, जिनके तहत- कचरे का स्रोत पर ही अलगाव जरूरी है. खुले में कचरा जलाना पूर्णतः प्रतिबंधित है. स्थानीय निकायों को वैज्ञानिक तरीके से निपटान सुनिश्चित करना अनिवार्य है. इन नियमों के बावजूद आदित्यपुर में स्थिति इसके ठीक विपरीत दिखाई दे रही है.
क्या हो सकते हैं समाधान ?
विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट से निपटने के लिए तत्काल और दीर्घकालिक कदम जरूरी हैं, जैसे वैज्ञानिक लैंडफिल साइट और वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना, कचरे का घर- घर पृथक्करण सुनिश्चित करना, डंपिंग साइट पर फायर कंट्रोल सिस्टम और गैस वेंटिंग व्यवस्था, नियमित मॉनिटरिंग और प्रदूषण स्तर की सार्वजनिक रिपोर्टिंग और दोषी एजेंसियों पर सख्त कार्रवाई.
कुल मिलाकर कहें तो आदित्यपुर में कचरे का यह “जहरीला धुआं” सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का भी बड़ा खतरा बन चुका है. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले दिनों में एक बड़े शहरी आपदा में बदल सकती है.
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