DESK झामुमो नेता गणेश महाली जमीन इन दिनों सुर्खियों में हैं. दरअसल एक जमीन के टुकड़े को लेकर झामुमो नेता सुर्खियां बटोर रहे हैं. मिडिया में रिपोर्ट आने के बाद महाली अपनी छवि खराब करने का आरोप विपक्ष यानि बीजेपी पर लगा रहे हैं. उस बीजेपी पर जिसमें रहकर उन्होंने रजनीति का ककहरा सीखा और पिछले 15 वर्षो से सत्ता के इर्द- गिर्द रहे.

दो बार बीजेपी के टिकट पर सरायकेला विधानसभा सीट से प्रत्याशी भी रहे. तीसरी बार चंपाई सोरेन के बीजेपी में एंट्री के बाद उन्होंने झामुमो के टिकट पर चुनाव लड़ा और एकबार पुनः बुरी तरह पराजित हुए. यदि वाकई गणेश महाली की छवि साफ- सुथरी थी तो फिर वो कौन सी वजह थी कि चंपाई सोरेन से लगातार वे हारते रहे. चंपाई ने तो अपनी श्रेष्ठता साबित कर दिया कि उनके लिए दल नहीं उनका चेहरा मायने रखता है. झामुमो में थे तब प्रचंड मोदी लहर में भी उन्होंने सरायकेला सीट बीजेपी की झोली में जाने नहीं दिया बीजेपी में रहते झामुमो की प्रचंड जीत में भी सरायकेला सीट पर अपने जीत का डंका बजा दिया.
जानकर इसके पीछे चंपाई सोरेन का व्यक्तित्व और उनका गरीबों के प्रति नज़रिया बताते हैं. तीन दशक तक राजनीति में अपनी दमदार उपस्थिति से चंपाई सोरेन ने हर उस दौर में अपनी श्रेष्ठता साबित किया है जब जब उनकी परीक्षा की घड़ी रही.
विगत 15 वर्षो की यदि हम बात कर लें तो चंपाई को गणेश महाली चुनौती देते रहे हैं गणेश महाली को यदि उसके बाद भी अपनी छवि बिगड़ने की चिंता सता रही है तो साफ है कि गणेश महाली का राजनितिक करियर ढलान पर चला गया है. जिस आदित्यपुर नगर निगम की जनता से उन्हें थोड़ा बहुत सम्मान मिल रहा था जमीन विवाद में उनका नाम आने के बाद इसमें कमी आयी है. पार्टी यानि झामुमो के बड़े वर्ग में भी इसको लेकर नाराजगी है. वैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता मगर जनता इसका सटीक विश्लेषण करती है. जिस जमीन के टुकड़े के लिए गणेश महाली ने सत्ता का साहरा लिया है वही जमीन का टुकड़ा उनके राजनीतिक करियर पर विराम लगा सकता है ऐसा जानकारों का मानना है. मिडिया को लेकर दिए गए उनके बयान की भी चारों ओर निंदा हो रही है.

