आदित्यपुर: टेंडर हो गया. एग्रीमेंट हो गया. संवेदक तय हो गया. योजना भी तय हो गई. बस एक चीज नहीं हुई- काम. आदित्यपुर नगर निगम में विकास की मौजूदा तस्वीर समझनी हो तो वार्ड संख्या 34 के बाबाकुटी रोड नंबर एस-2 चले आइए. यहां नंदलाल पंडित के घर से सियाशरण झा के घर तक बहने वाला मुख्य नाला जर्जर अवस्था की पराकाष्ठा पार कर चुका है. हालात ऐसे हैं कि लोगों के लिए घर से निकलना तक मुश्किल हो रहा है.


करीब आठ महीने पहले इस नाले के साथ रामसागर सिंह कुशवाहा के घर से रामसुरेश शर्मा के घर तक पेवर्स ब्लॉक सड़क और ह्यूम पाइप नाला निर्माण का टेंडर हुआ था. तत्कालीन नगर आयुक्त रवि प्रकाश ने तबादले से पहले संवेदक के साथ एग्रीमेंट भी कर लिया. एग्रीमेंट को करीब चार महीने होने जा रहे हैं, लेकिन योजना अब भी जमीन पर उतरने का इंतजार कर रही है.
बालू नहीं है साहब… इसलिए विकास भी नहीं है!
स्थानीय पार्षद का कहना है कि योजना शुरू कराने के लिए नगर निगम से कई बार पत्राचार किया गया, मगर जवाब मिलता है- बालू उपलब्ध नहीं है. संवेदक NGT की रोक और बालू की अनुपलब्धता का हवाला दे रहा है. नगर निगम भी सरकार और NGT से जुड़ी पाबंदियों की विवशता गिना रहा है.
मगर सवाल यहीं से शुरू होता है. जब निर्माण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं थी तो टेंडर क्यों हुआ ? एग्रीमेंट क्यों किया गया ? एग्रीमेंट के चार महीने बाद भी काम शुरू नहीं हुआ तो जवाबदेही किसकी है ? जनता को न NGT की फाइल समझनी है, न संवेदक और निगम के बीच का गणित. जनता ने टैक्स दिया है तो उसे सड़क, नाली, सफाई और स्ट्रीट लाइट चाहिए.
कागज पर योजनाएं, जमीन पर नाला- गंदगी और बदहाल सड़कें
समस्या केवल वार्ड 34 तक सीमित नहीं बताई जा रही है. नगर निगम क्षेत्र में नियमित डोर-टू-डोर कचरा उठाव, स्ट्रीट लाइट की मरम्मत, सड़कों और गलियों की स्थिति तथा सफाई व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. पुराने सफाई संवेदक को हटाए जाने के बाद नए टेंडर तक नगर निगम ने सफाई व्यवस्था खुद संभाली, लेकिन आरोप है कि सफाई अभियान चुनिंदा इलाकों तक सिमट गया है. पर्याप्त सफाईकर्मियों के अभाव का असर भी जमीन पर दिखाई दे रहा है.
सात महीने की नगर सरकार. जनता पूछ रही- बदलाव कहां है ?
नगर निगम चुनाव को करीब सात महीने गुजर चुके हैं. जनता ने इस उम्मीद में अपने प्रतिनिधि चुने थे कि वर्षों से अटके नागरिक मुद्दों को गति मिलेगी. लेकिन अब पार्षद फंड की अनुपलब्धता की बात कह रहे हैं. दूसरी तरफ मेयर-डिप्टी मेयर और पार्षदों के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी का नुकसान अंततः जनता को उठाना पड़ रहा है.
राम सागर सिंह कुशवाहा के मकान से राम सुरेश शर्मा के घर तक का रास्ता जहां पेवर्स ब्लॉक बिछाना है साथ में ह्युमपाईप लगाना है.
सार्वजनिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी और तस्वीरें लगातार सामने आती हैं, लेकिन वार्डों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली दूसरी तस्वीर पेश कर रही है. ऐसे में सवाल केवल किसी एक मेयर, डिप्टी मेयर, पार्षद, अधिकारी या संवेदक का नहीं है. सवाल पूरे सिस्टम का है.
आखिर जनता जाए तो जाए कहां ?
निजी नाले को बदलने के बाद अधूरा काम छोड़ भागा मजदूर
चुनाव से पहले स्वीकृत जिन योजनाओं की टेंडर और एग्रीमेंट प्रक्रिया तक पूरी हो चुकी है, यदि वे भी चार महीने में शुरू नहीं हो पा रही हैं तो नई योजनाओं का भविष्य क्या होगा ? संवेदक कहता है बालू नहीं है. निगम NGT और सरकारी पाबंदियों की विवशता बताता है. पार्षद कहते हैं फंड नहीं है. अधिकारी अपनी प्रक्रिया में हैं. जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल पर सवाल हैं. तो जनता किसके पास जाए?

बाबाकुटी का जर्जर नाला सिर्फ एक नाला नहीं है. यह उस व्यवस्था का आईना बन चुका है, जहां फाइलों में विकास दौड़ रहा है और जमीन पर जनता रास्ता तलाश रही है.

